सुप्रीम कोर्ट की नई रूलिंग

नई दिल्ली. अगर किसी अपराधी का वकील सुनवाई के दौरान न्यायालय में उपस्थित नहीं है तो न्यायालय को न्यायमित्र की नियुक्ति करनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने ये रूलिंग इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक अपील को खारिज करने के निर्णय पर दी है। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि किसी मामले में वकील के जरिए प्रतिनिधित्व कराने का अधिकार कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। शीर्ष अदालत ने वह अपील खारिज करने का इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला रद्द कर दिया जिसे 1987 में एक शख्स की हत्या के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति ने दायर किया था। अपील में कहा गया था कि उसका वकील सुनवाई के दौरान मौजूद नहीं था।

शीर्ष अदालत ने अपील बहाल करते हुए उच्च न्यायालय से कहा कि वह जल्दी किसी तारीख पर इसकी सुनवाई करने पर विचार करे। सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय से कहा कि अगर मामले में याचिकाकर्ता का प्रतिनिधिनत्व कोई वकील नहीं कर रहा हो तो वह अपनी सहायता के लिए अदालत मित्र (एमीकस क्यूरी) नियुक्त कर सकता है। न्यायमूर्ति यूयू ललित की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि यह स्वीकार्य है कि वकील के जरिए प्रतिनिधित्व कराने का अधिकार कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है और यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अधिकार गारंटी को संदर्भित है। पीठ में न्यायमूर्ति विनीत सरण और न्यायमूर्ति एस रविंद्र भट भी शामिल थे।

पीठ ने आदेश में कहा कि मामले में आरोपी का प्रतिनिधित्व कर रहा वकील किसी कारण से उपलब्ध नहीं है तो अदालत अपनी सहायता के लिए एमीकस क्यूरी नियुक्त करने के लिए स्वतंत्र है लेकिन किसी भी मामले में ऐसा नहीं होना चाहिए कि मामले का प्रतिनिधित्व नहीं हो रहा हो।

शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के अप्रैल 2017 में फैसले के खिलाफ दोषी की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया है। उच्च न्यायालय ने हत्या के एक मामले में दोषी को उम्र कैद की सज़ा सुनाए जाने के निचली अदालत के फैसले के खिलाफ उसकी अपील खारिज कर दी थी। उसने याचिकाकर्ता के वकील के इस अभिवेदन पर ध्यान दिया कि अपीलकर्ता की ओर से किसी भी प्रतिनिधित्व की अनुपस्थिति में उच्च न्यायालय ने अपील का निपटारा किया था।

पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने यह देखते हुए भी मामले की सुनवाई की कि व्यक्ति का प्रतिनिधित्व कोई वकील नहीं कर रहा था और निचली अदालत के नजरिया की पुष्टि कर दी। ऐसी परिस्थिति में हमारे पास उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश को निरस्त करने और आपराधिक अपील को बहाल करने के सिवाए कोई विकल्प नहीं है। पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय अपील का नए सिरे से निपटारा करे। अपीलार्थी को हत्या के एक मामले में निचली अदालत ने उम्र कैद की सज़ा सुनाई थी।

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