मोदी के मुकाबले में उतरते ही हाथ क्यों मलने लगती है पार्टी ?

नई दिल्ली. बिहार के चुनावी समंदर में डूबी कांग्रेस में फिर तूफान उठ रहा है। तूफान का केन्द्र वे कपिल सिब्बल हैं जो मोदी सरकार से पार्टी नेतृत्व को मिलने वाली तमाम चुनौतियों का सुप्रीम कोर्ट में डटकर मुकाबला करते आए हैं। पिछले छह साल से लगातार मुंह की खा रही कांग्रेस बिहार चुनाव में दस फीसदी से कम वोट और मात्र 19 सीटों पर सिमट गई है। इसके बावजूद नाकामियों पर गौर करने की अपेक्षा आलाकमान के भरोसेमंद नेता सिब्बल पर ही टूट पड़े हैं।

क्या महत्वहीन होती जा रही है कांग्रेस !

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राजनीतिक पार्टियां सफलता के लिए अपने प्रतिभाशाली नेताओं को मौके देती हैं। इसके लिए भाजपा का उदाहरण सबसे ताजा है, जिसने पार्टी को खड़ा करने में अपना सर्वस्व झौंक देने वाले लालकृष्ण आडवाणी के स्थान पर नरेन्द्र मोदी को आगे कर सत्ता पर कब्जा किया है लेकिन दिल्ली में दरबारियों से घिरी कांग्रेस अपने मजबूत क्षेत्रीय नेताओं को निपटाने में व्यस्त है। इसके लिए सिर्फ तीन दशक पहले पश्चिम बंगाल के दिग्गज कांग्रेस नेता सिद्धार्थ शंकर रे को याद किया जा सकता है। वे मरने से वाममोर्चा को बंगाल की खाड़ी में डुबोना चाहते थे। इसके लिए तब की युवा नेता ममता बनर्जी तैयार भी थी, लेकिन ममता का कद बड़ा न हो जाए, इसीलिए दिल्ली ने उन पर लगाम डाल दी। नतीजा ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी बनाई और पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज हो गई और कांग्रेस हाथ मलते रह गई।

इंदिरा के जमाने में शुरू हुआ जी-हुजूरी का चलन

राजनीतिक जानकारों के अनुसार कांग्रेस को इंदिरा गांधी के दौर से ही परिवार भक्त नेता पसंद हैं। बैंकों का राष्ट्रीयकरण, 1971 का युद्ध और जनता के बीच जाकर राजनीतिक कौशल का इस्तेमाल करके उन्होंने देश को जीत लिया, लेकिन उस वक्त दक्षिणपंथ शैशवावस्था में था और अन्य किसी पार्टी में उन्हें चुनौती देने का दम नहीं था। पार्टी के भीतर अलग राय इंदिरा गांधी को पसंद नहीं थी। उन्होंने राज्यों में कांग्रेस के संगठन और बड़े स्थानीय नेताओं को महत्वहीन बना दिया गया। जमीन पर मेहनत करने की जगह दिल्ली आकर शुरू हुआ जी हुजूरी का चलन अब पार्टी के गले का फंदा बन गया है।

क्षेत्रीय दलों ने काट दी कांग्रेस की टांग

अब पार्टी सिर्फ उन्हीं राज्यों में सत्ता में हैं, जहां भाजपा से उसका सीधा ​मुकाबला है। जिन राज्यों में क्षेत्रीय दल हैं, वहां उसकी लुटिया पूरी तरह डूब चुकी है। 2017 में पंजाब और 2018 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव जीतने वाली कांग्रेस मई 2019 के लोकसभा चुनावों में अपनी लुटिया डुबो बैठी। गुजरात विधानसभा के चुनावों में भी बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद लोकसभा चुनाव में पार्टी का स्कोर शून्य रहा। मध्य प्रदेश में उसे सिर्फ एक सीट मिली और अपनी सरकार वाले राज्य राजस्थान में उसका सफाया हो गया पंजाब अकेला राज्य है जहां कांग्रेस ने बढ़िया प्रदर्शन किया। 2020 के उपचुनावों में गुजरात, मध्य प्रदेश, यूपी और कर्नाटक में पार्टी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा।

वोटर मान रहे हैं बेदम हो चुकी है कांग्रेस

हालात ये हो गए हैं कि 2014 के बाद से प्रादेशिक पार्टियां भी उससे हाथ मिलाने पर कतरा रही हैं। कहा जा रहा है कि बिहार में कांग्रेस को 70 सीटें देकर महागठबंधन ने सबसे बड़ी भूल की। केंद्र में फिलहाल बीजेपी की सरकार को घेरने वाला कोई राष्ट्रीय दल नहीं है। राज्यों में कांग्रेस नहीं बल्कि क्षेत्रीय दल बीजेपी को चुनौती देते हैं। वोटर भी मानने लगे हैं कि कांग्रेस बेदम हो चुकी है।

नरेन्द्र मोदी के ब्रह्मास्त्र बन गए हैं राहुल गांधी !

राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि राहुल गांधी कांग्रेस की ऐसी कमजोरी बन चुके हैं जो नरेंद्र मोदी के ब्रह्मास्त्र में तब्दील हो गई है। परिवार और राजनीतिक नासमझी का ठीकरा बीजेपी हमेशा राहुल के सिर फोड़ती है। इतिहासकार रामचंद्र गुहा कई बार कह चुके हैं कि राहुल गांधी के कांग्रेस छोड़े बिना हाथ नहीं चमकेगा। ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी कमजोर नेता है। वक्त के साथ उनमें पैनापन आया है। नोटबंदी, जीएसटी और अर्थव्यवस्था पर उनका नजरिया कई अर्थशास्त्रियों को प्रभावित करता है, लेकिन कांग्रेस जैसे जर्जर जहाज को चलाने के लिए जमीन पर संगठन, कड़ी मेहनत और राजनीतिक चतुराई की जरूरत है। हालांकि पार्टी नेता कपिल सिब्बल, जयराम रमेश, शशि थरूर और मनीष तिवारी अलार्म बजा रहे हैं, लेकिन परिवार के वफादार नेता ऐसी आलोचनाओं को अपनी भक्ति दर्शाने के लिए इस्तेमाल करते हैं और ये नेता अलग-थलग पड़ जाते हैं।

Leave a comment

Your email address will not be published.