नई दिल्ली. पश्चिम बंगाल और पड़ोसी बांग्लादेश की सीमा पर जैव विविधता के लिए मशहूर और 4262 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले सुंदरवन के बूढ़े बाघ इंसानी खून के प्यासे हो गए हैं। लगातार घटती शारीरिक ताकत के चलते जानवरों का शिकार करने में अक्षम हो जाने वाले बूढ़े बाघ इंसानी बस्तियों के आसपास मंडराते रहते हैं। वे जंगल में शहद और जलावन के लिए आने वालों को भी नहीं बख्श्ते।

2070 तक नहीं बचेगा सुंदरवन!

सुंदरबन इलाके में 102 द्वीप हैं। उनमें से 54 द्वीपों पर आबादी है। मछली मारना और खेती करना उनकी आजीविका है। एक अध्ययन में इलाके के मैंग्रोव जंगलों के तेजी से घटने पर चिंता जताते हुए कहा गया है कि यही स्थिति रही तो वर्ष 2070 तक बाघों के रहने लायक जंगल नहीं बचेगा।

हर साल सौ से ज्यादा इंसानों को खाकर पेट भरते हैं बाघ

सुंदरबन इलाके में बाघों के जंगल से निकल कर इंसानी बस्तियों में आने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। सुंदरबन में हर साल औसतन 35 से 40 लोग बाघ के शिकार बन जाते हैं। स्थानीय लोग कहते हैं कि इलाके में हर साल अममून सौ से ज्यादा लोग बाघ के जबड़ों में फंस कर जिंदगी गंवा देते हैं। वन विभाग सुंदरबन में हर साल लगभग 40 लोगों को जंगल से शहद इकट्ठा करने और मछली पकड़ने का परमिट देता है। लेकिन हजारों लोग जंगलों में जलावन और वन उत्पाद एकत्र करने व मछली पकड़ने जाते हैं।
पानी का खारापन बढ़ने से परेशान हैं बाघ

एक विशेषज्ञ समिति के अनुसार सुंदरबन से सटी बंगाल की खाड़ी का जलस्तर और पानी में खारापन बढ़ने, बाघों के शिकार की जगह लगातार घटने और पसंदीदा भोजन नहीं मिलने की वजह से बाघ भोजन की तलाश में इंसानी बस्तियों में आते हैं। बाघ तभी जंगल से बाहर निकलते हैं जब वह बूढ़े हो जाते हैं और जंगल में आसानी से कोई शिकार नहीं मिलता। सुंदरबन के जिस इलाके में बाघ रहते हैं वहां पानी का खारापन बीते एक दशक में 15 फीसद बढ़ गया है। इसलिए बाघ धीरे-धीरे इंसानी बस्तियों में पहुंचने लगे हैं।

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