सुभाष राज
नई दिल्ली. करीब 70,000 वर्ग किलोमीटर नया रेगिस्तान हर साल बनता है। ये आयरलैंड के क्षेत्रफल के बराबर है। अफ्रीका की 40 प्रतिशत जनसंख्या रेगिस्तान के मुहाने पर रहती है। एशिया और दक्षिण अमेरिका में क्रमश: 39 और 30 प्रतिशत हैं। जर्मनी, अमेरिका और स्पेन पर भी इसी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। हजारों साल पहले सहारा रेगिस्तान में हाथी और दरियाई घोड़े रहा करते थे। यानी ये पूरा इलाका जंगल था क्योंकि दोनों जानवर जंगल में ही रह सकते हैं। अब इस बियावान रेगिस्तान में कुछ प्राणी ही जीवित रह पाते हैं। दुख की बात ये कि इंसानी गतिविधियां रेगिस्तान में वृद्धि कर रही हैं।

यूरोपीय देशों में भी जमीन में दरार और सूखे जलमार्ग समस्या बन गए हैं। स्पेन में मरुस्थलीकरण बढ़ने का कारण यहां जंगल सफारी और सामान्य विदेशी सैलानियों की बढ़ती संख्या है। होटल के लिए जंगल काटे जा रहे हैं। मिट्टी हटाकर जमीन पर कंक्रीट बिछाया जा रहा है। जैसा कि आप जानते ही हैं कि मरुस्थलीकरण मतलब उपजाऊ जमीन का रेगिस्तान बन जाना है। असल में जब लोग पानी का जरूरत से ज्यादा दोहन करते हैं तो पेड़-पौधे खत्म हो जाते हैं और जमीन बंजर हो जाती है।

बारिश से बंजर होती है घास-पात विहीन मिट्टी
जनसंख्या वृद्धि मरुस्थलीकरण में बढ़ोतरी का दूसरा बड़ा कारण है। इसके चलते किसान अपने जानवरों को चारागाहों में ले जाते हैं और वे पूरे के पूरे चारागाह को ही साफ कर देते हैं। घास-पात विहीन ये मिट्टी पक्की होकर हवा और बारिश से बंजर हो जाती है। इससे हर साल करीब 2,500 वर्ग किलोमीटर रेगिस्तान बन रहा है।

मरुस्थलीकरण से पानी और उपजाऊ भूमि खत्म हो जाती है और इलाके में रहने वाले लोगों को जीने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। जर्मन संस्था जीआईजेड के अनुसार मरुस्थलीकरण ने अफ्रीका की 48.5 करोड़ जनसंख्या को मुश्किल में डाल रखा है। मरुस्थलीकरण के चलते 2020 तक अफ्रीका के 6 करोड़ लोगों को इलाका छोड़कर जाना पड़ सकता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि कई देश मरुस्थलीकरण के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। चीन का 1978 में शुरू ग्रेट ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट 2050 तक जर्मनी के बराबर क्षेत्र में फैल जाएगा।

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