जयपुर. राजस्थान में होम्योपैथी चिकित्सकों ने आयुर्वेद के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। होम्योपैथी चिकित्सकों का आरोप है कि राज्य में आयुष के लिए मिलने वाले अधिकांश बजट को आयुर्वेद निगल जाता है। नियुक्तियों में भी उसे ही प्राथमिकता मिलती है जबकि विश्व की सबसे नवीनतम चिकित्सा पद्धति होम्योपैथी को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ऐलोपैथ के बाद दूसरी चिकित्सा पद्धति के रूप में मान्यता दी है।

होम्योपैथी चिकित्सकों ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पत्र लिखकर आयुर्वेद को मिल रही प्राथमिकता पर सवाल खडे किए हैं। उन्होंने कहा है कि जब केन्द्र में आयुष मंत्रालय बनाकर सभी भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को बराबर का दर्जा दिया है तो राजस्थान में सिर्फ आयुर्वेद को प्राथमिकता क्यों मिल रही है? उन्होंने राजस्थान आयुर्वेद यूनिवर्सिटी का नाम बदलकर आयुष यूनिवर्सिटी करने की मांग के साथ कहा है कि राज्य के आयुर्वेद विभाग में बड़े पदों पर सिर्फ आयुर्वेद का ही कब्जा है। होम्योपैथी और यूनानी को आयुर्वेद विभाग के बजट में से मामूली हिस्सा ही मिल पाता है जिससे इन दोनों पद्धतियों के विकास में बाधा आ रही है।

पत्र में कहा गया है कि राजस्थान में आयुर्वेद चिकित्सकों का मानदेय एलोपैथिक चिकित्सकों के बराबर कर दिया गया है लेकिन होम्योपैथी को अभी तक ये दर्जा नहीं मिल पाया है। होम्योपैथी चिकित्सकों का आरोप है कि आयुर्वेद विभाग में निकलने वाली रिक्तियों में 80 प्रतिशत भर्ती आयुर्वेद चिकित्सकों तथा कम्पाउंडरों की होती है। आंकडों के हिसाब से अभी राज्य में आयुष चिकित्सक के कुल 5080 पद हैं, जिनमें से 88.40 प्रतिशत पदों पर आयुर्वेद का कब्जा है। होम्योपैथी को इसमें से सिर्फ 296 पद मिले हुए हैं। यूनानी को 308 पद दिए गए हैं।

अलबत्ता शैक्षिक लिहाज से राजस्थान में होम्योपैथी ठीक अवस्था में है। राज्य में होम्यापैथी के 10 कॉलेज हैं और आयुर्वेद कॉलेज भी 10 ही हैं। यूनानी के प्रदेश में 3 कॉलेज हैं। जहां छात्रों के रूझान का सवाल है तो होम्योपैथी पढ़ने वाले छात्रों की संख्या आयुर्वेद से अधिक है।

होम्योपैथी चिकित्सकों ने पपत्र में मांग की है कि राज्य की प्रत्येक पीएचसी और सीएचसी पर होम्योपैथी का चिकित्सक का पद सृजित किया जाए। आदर्श पीएचसी पर भी आयुर्वेद की अपेक्षा होम्योपैथी चिकित्सक लगाया जाए। इसके अलावा केंद्र सरकार की तर्ज पर राजस्थान में आयुर्वेद विभाग को आयुष विभाग में तब्दील करके भर्ती में आयुर्वेद का 45, होम्योपेथी का 45 और यूनानी का दस प्रतिशत अनुपात निर्धारित किया जाए।

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