नई दिल्ली. ​हिमालयन काले भालू ने शीतनिद्रा त्याग दी है। वे अब भारी बर्फबारी के दौरान भी भोजन की तलाश में घाटियों की खाक छानते रहते हैं। भोजन की ये तलाश हिमालय के कश्मीर रीजन में भालुओं और कश्मीरियों के बीच संघर्ष का कारण बन रहा है।

जम्मू-कश्मीर प्रशासन के आंकडों के अनुसार पिछले पांच सालों में जंगली जानवरों के हमले में 67 लोग मारे गए और 940 घायल हो गए। ये सभी भोजन की तलाश कर रहे काले भालुओं के हमले का शिकार हुए थे।

बीते अगस्त में अपने सब्जियों के खेत में काम कर रहे किसान को काले भालू ने घायल कर दिया। पिछले साल श्रीनगर के हरवान इलाके में एक काले भालू ने दो भाइयों पर हमला कर दिया जिसमें एक भाई की जान चली गई। असल में कश्मीर में बड़े बड़े धान के खेतों को सेब के बगीचों में बदल दिया गया है। दलदली जमीन और जंगलों के आस पास नई आबादी बस गई है। जंगलों का तेजी से क्षरण हो रहा है। इसके अलावा सेना के मूवमेंट की वजह से जानवरों का शिकार लगभग थम गया है।

इससे काले भालुओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। कश्मीरी वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार जानवरों को बगीचों में और जंगलों की तलहटी में बसी बस्तियों के आसपास आसानी से भोजन और आश्रय मिल जाता है। इससे वे बार-बार वहां आते हैं और इसी दौरान उनकी इंसानों से मुठभेड़ हो जाती है।

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार पहले काले भालू सर्दियों में शीत निद्रा में चले जाते थे, लेकिन अब वो कडकडाती सर्दियों में भी शिकार की तलाश में घूमते हैं। भालुओं के घाटी में आने का एक कारण सेना शिविरों के किचन से फेंका गया खाना भी है। इसके अलावा एलओसी पर हजारों किलोमीटर तक फैली कंटीली तारों से भी उनके गलियारे बंद हो गए हैं जिससे वे भारतीय और पाकिस्तानी इलाकों में कैद होकर रह गए हैं।

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