हिंसक आंदोलन को कुचलने में सफल होगी सरकार !

कुमार उमेश

नई दिल्ली.  दो महीने से चला आ रहा किसान आंदोलन गांधी जी के असहयोग आंदोलन की तरह हिंसा का शिकार हो गया। चौरीचोरा कांड के बाद गांधीजी को जैसे असहयोग आंदोलन को अंजाम तक पहुंचने से पहले समाप्त करना पड़ा ठीक वैसे ही किसान आंदोलन का हश्र होते दिख रहा है। हिंसक होने के बाद अब इस आंदोलन को सरकार आसानी से कुचल सकती है। इतना ही नहीं हिंसक होने के बाद लोगों की सहानुभूति भी किसान आंदोलन से दूर हो जाएगी।

दो महीने तक किसानों ने राजनीतिक दलों को अपने आंदोलन में घुसने नहीं दिया। लेकिन दिल्ली में Tractor Rally: ट्रैक्टर मार्च के बहाने असामाजिक तत्वों ने घुसपैठ कर आंदोलन को हिंसक बना दिया। ये असामाजिक तत्व किस दल से सम्बंध रखते हैं इसका किसी को पता नहीं। पर आंदोलन के हिंसक होने का सबसे अधिक फायदा सरकार को होना तय है। सरकार अब बलपूर्वक ​इस आंदोलन से निपट लेगी। सरकार के बल के आगे आंदोलन का टूटना तय है। अगर किसान नेता गांधी जी की राह पर चले तो वह आंदोलन को खत्म करने की घोषणा भी कर सकते हैं। लेकिन इन किसान नेताओं को दुबारा से आंदोलन खड़ा कर पाना उतना आसान नहीं होगा। इसलिए आंदोलन को वापस लेने से पहले हजार बार सोचेंगे।

लालकिले पर आंदोलन​कारियों ने जमाया कब्जा

किसान आंदोलनकारी बड़ी संख्या में लालकिले पहुंच गए हैं। लालकिले पर किसानों ने कुछ देर के लिए अपना कब्जा जमा लिया। बाद में पुलिस ने लालकिले को खाली करवाया। आंदोलन हिंसक होने से पहले किसानों ने आज गांधी जी के चंपारण आंदोलन की याद दिला दी। अंग्रेजों की चूलें हिलाने वाले चंपारण आंदोलन की तरह तीनों कृषि कानून के खिलाफ चलाए गए किसान आंदोलन ने मंगलवार को दिल्ली की चूलें हिला दी। किसानों के दिल्ली कूच ( Tractor Rally ) ने एक दिन के लिए उन्हें राजधानी का बादशाह बना दिया। इस बादशाहत में दिल्ली की जनता ने भरपूर साथ दिया। इस बीच दिल्ली के आईटीओ पर पहुंचे किसानों पर पुलिस ने लाठी चार्ज किया जिससे एक किसान की मौत हो गई।

दिल्ली की जनता ने किया स्वागत

किसानों के इस दिल्ली मार्च को स्थानीय लोगों का ठीक वैसा ही समर्थन मिला, जैसा चंपारण के किसान आंदोलन में मिला था। वह आंदोलन अंग्रेजों की सत्ता को झुकाने वाला पहला सफल आंदोलन था। कृषि कानून के खिलाफ आज के आंदोलन की राह भी वैसी ही दिख रही है। किसानों ने दिल्ली की सभी मुख्य सड़कों पर पूरी तरह से कब्जा जमा लिया। उनका ट्रैक्टर मार्च ( Tractor Rally) को पूरी दिल्ली ने मीडिया के माध्यम से नहीं, बल्कि खुद ही अपनी आंखों से देखा। दिल्ली के लोगों ने किसानों का तहेदिल से स्वागत किया। लोगों ने बिना तैयारी के अपने क्षेत्र से गुजरते हुए किसान मार्च का फूलों से स्वागत किया। दौड़-दौड़ कर लोगों ने किसानों को पानी पिलाया और फल भी खिलाएं। आनन-फानन में चाय की भी व्यवस्था की गई। किसानों के इस स्वागत की भागीदारी में पुरूष ही नहीं स्थानीय महिलाएं और बच्चे ने भी अपनी भूमिका निभाने में कोताही नहीं बरती। पुलिस जगह-जगह मात्र मूकदर्शक बनकर खड़ी रही। सड़क पूरी तरह से किसानों के कब्जे में था। भीड़ अनियंत्रित थी, इसके बावजूद स्थानीय लोगों के साथ कहीं भी गरमा-गर्मी तक नहीं हुई। महिलाओं के द्वारा किसान को दी जा रही मदद को भी हाथ जोड़ कर किसानों ने इज्जत देते हुए स्वीकार किया। अनियंत्रित और बेकाबू भीड़ का इस तरह से स्वयंमेव नियंत्रण शायद ही किसी भी रैली या मार्च में अब तक देखने को मिला है।

पुलिस से भिड़ने में पीछे नहीं हटे किसान

जय जवान और जय किसान के बीच में खड़ी सरकार ने आज दोनों को आमने सामने लाने में सफलता हासिल कर ली। जवानों ने किसानों को रोकने का प्रयास किया, पर सफल नहीं हो पाए। मुर्करबा चौक, गाजीपुर बोर्डर, टीकरी बोर्डर, सिंधु बोर्डर लगभग सभी जगह किसानों ने पुलिस के बैरिकेट को तोड़ दिल्ली की सीमा में समय से पहले घुस आए। निर्धारित मार्ग को छोड़ किसानों  ( Tractor Rally ) ने दिल्ली के केंद्र की सड़कों पर अपना कब्जा जमा लिया। चहुंओर से किसानों का यह जत्था आईटीओ पहुंच गया। वहां से इंडिया गेट की ओर बढ़ने का दबाव बनाया जा रहा है। किसान जिस तरह जमा हो रहे हैं उनसे उन्हें इंडिया गेट तक जाने से रोक पाना संभव नहीं दिख रहा है। पुलिस ने कई जगहों पर किसानों को रोकने के लिए अश्रु गैस के गोले भी दागे। पर यह भी कारगर नहीं रहा। किसानों ने तो पुलिस के कई गोले उठाकर उल्टा उन्हीं की ओर फेंक दिया। अंतत: पुलिस को हार माननी पड़ी और किनारे होने में ही भलाई समझी। जीत हासिल करने के बावजूद किसानों ने पुलिस को बिना चिढ़ाते हुए आगे बढ़ गए। पुलिस ने गोली नहीं चलाई। यह उनकी समझदारी थी। वर्ना गोली चलती तो कई किसान मारे जाते।

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