नई दिल्ली. दिल्ली को घेर कर बैठे किसानों ने 32 साल पहले वोट क्लब पर दिए गए किसानों के धरने के रिकार्ड को तोड़ दिया है। दिल्ली के वोट क्लब पर उत्तरप्रदेश के किसान नेता महेन्द्र सिंह की अगुवाई में किसान तीन दशक पहले अचानक आ धमके थे। आखिरकार राजीव गांधी सरकार को उनकी मांगे पूरी करनी ही पड़ी थीं। उस प्रदर्शन के बाद ही वोट क्लब को प्रदर्शनों के लिए प्रतिबंधित करके जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में चिन्हित कर दिया गया था।

आंदोलन पर बारीकी से नजर रखने वाले दिल्ली के पत्रकारों का कहना है कि आंदोलन के ग्यारहवें दिन में प्रवेश करते ही ये आशंका बढ़ रही है कि कहीं ये टिकैत के आंदोलन जैसी गर्मी ग्रहण नहीं कर लें क्योंकि दसवें दिन शनिवार को प्रदर्शनकारी किसानों और सरकार के बीच हुई पांचवें दौर की बैठक में भी ठोस निर्णय नहीं हो सका। सरकार ने किसान संगठनों को नौ दिसंबर को अगले दौर की बातचीत का प्रस्ताव दिया है जिसे किसानों ने मान लिया है।

इधर किसान संगठनों ने आठ दिसंबर को भारत बंद का आह्वान किया है। बंद को कई ट्रेड यूनियन संगठनों और राजनीतिक दलों ने समर्थन दिया है। किसान तीन कृषि कानूनों को वापस लिए जाने की मांग पर अडे हैं। शनिवार को लगभग पांच घंटे तक चली बैठक के बाद कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा कि सरकार किसानों के हितो की रक्षा को लेकर प्रतिबद्ध है। एपीएमसी का विषय राज्यों से संबद्ध है और केंद्र सरकार इसे और मजबूत करना चाहती है।

तोमर ने दावा किया कि छह साल के मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान कृषि के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन किए गए जिससे किसानों की आय बढ़ी। कृषि बजट बढ़ाया गया, कृषि उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया गया, फसलों की खरीद बढ़ी और नई तकनीकों को अपनाया गया।

किसान सम्मान निधि योजना के तहत किसानों को एक साल में 75 हजार करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता दी गई है। कृषि आधारभूत संरचना कोष के तहत एक लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। किसान जब तक प्रसंस्करण से नहीं करेंगे तब तक उन्हें फसलों का अच्छा मूल्य नहीं मिलेगा। बैठक के दौरान सरकार के तर्कों को खारिज कर दिया गया। किसानों ने जोर देकर कहा कि सरकार तीनों कानूनों को रद्द करें। जबकि सरकार ने तीनों कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव दिया है।

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