नई दिल्ली. क्या मोदी सरकार कड़ाके की ठंड और मौसम की मार के बीच दिल्ली को घेरे बैठे किसानों के मन की बात सुनेगी अथवा सत्ता की अकड़ में इस आंदोलन को कुचलने या असफल बनाने के प्रयास जारी रखेगी? क्योंकि आंदोलन कर रहे किसानों और केंद्र सरकार के बीच पांचवे दौर की बातचीत में भी कुछ नतीजा नहीं निकल सका। किसानों का कहना है कि वे नए कृषि क़ानूनों को वापस लिए बिना पीछे नहीं हटेंगे लेकिन सरकार ने अभी तक ऐसे कोई संकेत नहीं दिए हैं!

अब सवाल है कि मोदी सरकार कानूनों को वापस लेने पर विचार कर रही है अथवा कुछ और सोच रही है। सरकार चला रही भाजपा के एक उच्च पदस्थ सूत्र का कहना है कि सरकार का कानून वापस लेने का कोई इरादा नहीं है। सरकार के मंत्रालय कई फ़ॉर्मूले पर चर्चा कर रहे हैं और शायद उसी से निकले निष्कर्ष के आधार पर सरकार के वार्ताकार 9 दिसम्बर को किसानों के सामने एक नया प्रस्ताव रख सकते हैं। प्रस्ताव में किसान हितों का खास ख्यान रखने का प्रयास भी किया जाएगा।

यहां यह बता देना उचित होगा कि सरकार और किसान नेताओं के बीच 5 दिसम्बर को हुई बातचीत के दौरान सरकार ने किसान यूनियनों से ठोस प्रस्ताव तैयार करने के लिए समय मांगा था। संभव है कि सरकार नए क़ानूनों में किसानों की कुछ मांगों को शामिल कर ले। अगर ऐसा हुआ तो संसद के अगले सत्र में ही ये मुमकिन हो सकेगा। मुख्यधारा के मीडिया में किसान आंदोलन को ठीक से कवर नहीं किए जाने के बावजूद सोशल मीडिया के कारण खबरों के केन्द्र में आए आंदोलन को केंद्र सरकार नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती।

भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता के अनुसार धरने पर बैठे हज़ारों किसान अपनी मांग पूरी करवा कर ही लौटेंगे। उनके बीच फूट डालने की कोशिश को किसानों ने नाकाम कर दिया है। अगर सरकार निजी व्यापारियों और कॉर्पोरेट कंपनियों की ख़रीदारी पर भी एमएसपी लगा दे तो किसानों का शोषण होने की आशंकाओं को दूर किया जा सकेगा।

उल्लेखनीय है कि 2019-20 में एमएसपी पर ख़रीदी जाने वाली फ़सलों में से गेहूं और चावल दोनों को जोड़कर लगभग 2.15 लाख करोड़ रुपए मूल्य की सरकारी ख़रीद एमएसपी पर की गई। चावल के 11.84 करोड़ टन उत्पादन में से 5.14 करोड़ टन की एमएसपी पर सरकारी ख़रीद हुई। गेहूं के 10.76 करोड़ टन उत्पादन में से 3.90 करोड़ टन की सरकारी ख़रीद हुई।

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