ये है किसान और सरकार के बीच घमासान का असली सच

नई दिल्ली. सरकार और किसानों के बीच दिल्ली में चल रहे घमासान पर पूरे देश की नजर है। किसान जिस एमएसपी की गारंटी लिखित में चाहते हैं, उसे देने को केन्द्र सरकार तैयार नहीं है। ऐसा करते ही तीनों नए कृषि विधेयक कारपोरेट के काम के नहीं रह जाएंगे। जैसे ही एमएसपी की बाध्यता लागू होगी, वैसे ही कृषि उत्पादों के व्यापार से मोटा लाभ कमाने का सपना धूल धूसरित हो जाएगा।

इसलिए गारंटी देने को तैयार नहीं है सरकार

एमएसपी की गारंटी देते ही कृषि क्षेत्र में उतरने को अकुला रहा कारपोरेट फसल की खरीद एमएसपी से नीचे नहीं कर पाएगा। नतीजा, कारपोरेट कृषि उत्पादों का व्यापार उस तरह नहीं कर पाएगा जिस तरह वह अन्य व्यापार करता है। वह ना तो फसल के वक्त मूल्य गिराकर खरीद कर पाएगा और ना ही मांग और आपूर्ति के हथियार का इस्तेमाल करके बाजार को अपने इशारों पर नचा पाएगा। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनका मंत्रिमंडल ये तो कह रहा है कि एमएसपी बंद नहीं होगी लेकिन उसकी गारंटी देने को तैयार नहीं है।

एमएसपी के छाते तले फल-फूल रही हैं मंडिया

असल में एमएसपी भले ही छह-सात प्रतिशत किसानों को लाभ देता हो, लेकिन इसके छाते तले ही मंडी व्यवस्था फल-फूल रही है। एमएसपी की गारंटी दिए बिना नए कृषि कानून लागू होते ही मंडियों से बाहर होने वाली खरीद-बिक्री मांग और आपूर्ति के कुचक्र में फंस जाएगी। सभी जानते हैं कि रबी और खरीफ सीजन के वक्त दाम एकाएक नीचे आ जाते हैं और जैसे ही मंडियों में खरीद समाप्त होती है, दाम फिर से चढ़ने लगते हैं। इसी के चलते पूर्व में न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली लागू की गई थी। अभी धान, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, मक्का, मूंग, मूंगफली, सोयाबीन, तिल और कपास जैसी 23 फसलें एमएसपी पर खरीदी जाती हैं। यहां उल्लेखनीय है कि शांता कुमार कमेटी सरकारी खरीद को कम करने की सिफारिश कर चुकी है। इसी के चलते एमएसपी को निष्प्रभावी बनाने के लिए तीनों नए कानून लाए गए हैं। नीति आयोग भी सरकार को ऐसी सलाह दे चुका है।

धूल-धूसरित हो जाएगा बाजार पर वर्चस्व का सपना

निजी कंपनियां एमएसपी पर फसल ख़रीद को तैयार नहीं होंगी। निजी कंपनियां चाहेंगी कि एमएसपी से कम पर खरीदें। इसी के चलते सरकार निजी कंपनियों पर एमएसपी की शर्त थोपना नहीं चाहती। अगर एमएसपी का प्रावधान क़ानून में जोड़ दिया गया तो निजी कंपनियां बाजार पर वर्चस्व नहीं बना पाएंगी। निजी कंपनियां सामान की कीमत मांग और आपूर्ति के आधार तय करती हैं। किसानों का ये अंदेशा ठीक ही लगता है कि अनाज की आपूर्ति में कृत्रिम कमी लाकर मोटा लाभ कमाने की फिराक में बैठी निजी कम्पनियां खरीद कम करके किसान को कम कीमत पर फसल बेचने को बाध्य कर सकती है। एक अनुमान है कि भारत में 85 फीसदी छोटे किसानों के पास खेती के लिए पांच एकड़ से कम जमीन है।

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