नई दिल्ली. जहां कांग्रेस के साथ गठबंधन करके क्षेत्रीय दल और ताकतवर होकर उभरते हैं, वहीं भाजपा के साथ गठबंधन करने वालों को अपनी जमीन खोनी पड़ती है। इसका प्रमाण जम्मू-कश्मीर के स्थानीय चुनावों के नतीजे हैं जिनमें भाजपा ने पूर्व में गठबंधन सहयोगी रही पीडीपी के जनाधार को निगल लिया है।

इसके चलते पीडीपी को जम्मू-डिवीजन के 10 जिलों में फैली जिला विकास परिषद की 140 सीटों में में से सिर्फ एक पर कामयाबी मिल पाई है जबकि अतीत में पीडीपी का राजौरी और पुंछ में यहां तक कि सिखों और हिन्दुओँ के प्रभाव वाले रणबीर सिंह पोरा जैसे इलाकों में भी मजबूत आधार हुआ करता था।

बेमेल गठबंधन के बावजूद भाजपा ने उसका पूरा फायदा उठाया है और उसने उस घाटी में दो सीट जीत ली हैं, जहां जीत का सपना भाजपा ने कभी देखा तक नहीं। बीजेपी ने जिन दो सीटों पर अपना परचम फहराया है, उनमें नियंत्रण रेखा के पास का इलाका तुलेली भी शामिल है। बीजेपी ने दूसरी सीट श्रीनगर के बाहरी इलाके में 832 वोटों से जीत हासिल की है।

2019 के लोकसभा चुनाव इस बात का सबूत है कि पूरी घाटी और दक्षिण कश्मीर के ज्यादातर इलाकों में पीडीपी का प्रभाव रहा है लेकिन स्थानीय निकाय चुनावों में उसका वोट खिसकता हुआ साफ दिख रहा है। पीडीपी ने जम्मू डिवीजन में जनाधार क्यों खोया, जानकार इसका कारण उसकी अलगाववादियों के प्रति नरमी को मानते हैं।

भाजपा की राजनीतिक रणनीति पैनी नजर रखने वाले प्रेक्षकों का मानना है कि उसके साथ जो भी पार्टी गठबंधन में आती है, उसका अपना आधार असंतुष्ट हो जाता है क्योंकि गठबंधन होने के बावजूद भाजपा अपनी उग्र हिन्दुत्व नीति को विराम नहीं देती और उसके नेता अपने समर्थकों को लगातार ये संकेत देते रहते हैं कि गठबंधन सत्ता के लिए नहीं बल्कि हालात को बदलने के लिए किया गया है। इसी रणनीति के चलते वह जम्मू-कश्मीर में पीडीपी जैसी पार्टी के साथ गठबंधन करके भी स्थानीय चुनाव जीतने में कामयाब हो गई।

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