सुभाष राज

नई दिल्ली. उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव दिलचस्प होता जा रहा है। सभी दलों ने उम्मीदवारों की अपनी पहली सूची जारी कर दी है। नेताओं का खेमा बदलना बदस्तूर जारी है। इस खेमेबाजी का सबसे ज्यादा खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ रहा है। मंत्रियों समेत विधायकों द्वारा भाजपा छोड़ने वालों की सूची बढ़ती जा रही है। समाजवादी पार्टी का कुनबा लगातार बढ़ रहा है। भाजपा छोड़ने और सपा का कुनबा बढ़ने को बारीकियों से देखा जाए तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की लड़ाई की स्पष्ट लकीरें खींचने लगी है। यह लड़ाई मंडल बनाम कमंडल की ओर संकेत कर रही है।

जब-जब मंडल बनाम कमंडल की लड़ाई ठनी है, तब-तब कमंडल पर मंडल का जमावड़ा भारी पड़ा है। कमंडल का जल मंडल की लहर में बह गया है। उत्तर प्रदेश में भी चुनावी लड़ाई इसी दिशा की ओर बढ़ती जा रही है। भाजपा इस दिशा को अगर नहीं मोड़ पायी तो पार्टी के लिए तीन अंकों में पहुंचना भी मुश्किल हो जाएगा। वर्ष 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव का परिणाम इसका उदाहरण है। जब लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने मिलकर भाजपा के स्टार प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के बावजूद पार्टी को धूल चटाने में सफलता हासिल की थी। उत्तर प्रदेश का चुनाव भी इसी नक्शे कदम पर चल निकला है।

पिछड़ा बनाम अगड़ा

उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव अगड़ा बनाम पिछड़ा में तब्दील होता जा रहा है। पर्दे के पीछे से मुलायम सिंह यादव द्वारा चली जा रही चालें पर्दे के आगे अखिलेश यादव निभा रहे हैं। यादव से इतर पिछड़े वर्ग की अन्य जातियों को साधने का काम किया जा रहा है। साथ में दलितों को भी जोड़ा जा रहा है। पिछड़ा वर्ग सपा के झंडे के नीचे एकजुट होने लगा है। पिछड़े वर्ग की इसी एकजुटता के डर ने भाजपा को अपनी रणनीति बदलने को मजबूर कर दिया।

60 फीसदी टिकट पिछड़े और दलितों को

यही वजह है कि भाजपा द्वारा घोषित पहली सूची में 60 फीसदी टिकट पिछड़े और दलितों को देना पड़ा। अपनी इस सूची में 20 से अधिक विधायकों के टिकट काटने पड़े। भाजपा ने अगड़ों को साधने के लिए ब्राह्मण कार्ड खेला। ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करने के लिए एक समिति बनाई। लेकिन भाजपा का यह दांव उलटा पड़ गया। ब्राह्मण तो पहले से ही भाजपा के साथ थी। कुछ ब्राह्मण नेता अपनी टिकट की दावेदारी पक्की करने के लिए जरूर नाराजगी का संदेश बाहर फैलाने में जुटे हुए थे।

असलियत में ब्राह्मणों का अभी भाजपा से दूर होने का कोई इरादा नहीं था। उत्तर प्रदेश में काफी समय बाद अगड़ी जातियों के हाथ में सत्ता आई थी। वह किसी भी हालत में इसे छोड़ना नहीं चाहती है। ऐसे में भाजपा द्वारा चला गया दांव पिछड़ों को एकजुट करने का काम कर गया। सपा ने इसका लाभ उठाने में कोताही नहीं बरती। सपा ने इस बात को जमीनी स्तर पर फैलाया। इसका परिणाम भी देखने को मिलने लगा। चुनाव की घोषणा होने के बाद पिछड़े वर्ग के नेता एक के बाद एक सपा का दामन थामने लगे। इससे पूरी तरह से चुनाव की धुरी 180 डिग्री पर घूम गई। उत्तर प्रदेश की चुनावी लड़ाई सीधे सपा बनाम भाजपा हो गई है। सपा अपने आपको पिछड़े वर्ग की पार्टी कहलाने का संदेश देने लगी और भाजपा को अगड़ी जातियों की पार्टी बताने का।

बसपा की कमजोरी सपा के लिए वरदान

उत्तर प्रदेश में दलितों की संख्या देश के बाकी राज्यों की तुलना में अच्छी खासी है। पंजाब के बाद सबसे ज्यादा दलित उत्तर प्रदेश में ही पाए जाते हैं। दलितों का बड़ा जनाधार की वजह से ही बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में काफी मजबूत मानी जाती है। इसी जनाधार ने बसपा को सत्ता की चाबी सौंपने का काम भी किया था। पर बसपा सुप्रीमो मायावती चुनावी रण में काफी पिछड़ती दिख रही है। चुनावी प्रचार में भी मायावती नजर नहीं आ रही है। मायावती का पिछड़ना सपा के लिए वरदान होता जा रहा है। मायावती के पिछड़ने से दलित वोट का एक बड़ा तबका सपा की ओर जाता दिख रहा है। क्योंकि पिछले कुछ सालों से दलितों की नाराजगी भाजपा से बढ़ी है।

Leave a comment

Your email address will not be published.