मंडी अधिनियम समाप्त होने का खामियाजा

नई दिल्ली. राजधानी दिल्ली को घेरे बैठे किसानों की मंडी व्यवस्था समाप्त होने पर संकट में फंस जाने की चिंता बेजा नहीं है क्योंकि उनके सामने बिहार का उदाहरण मौजूद है, जहां लगभग चौदह साल पहले मंडियों का संचालन करने वाले एपीएमसी अधिनियम को समाप्त कर दिया गया था। बिहार का उदाहरण इसका प्रमाण है कि मंडियों के संचालन में बाधा आने पर उपज को औने-पौने दामों में बेचने का खतरा मुंह बाएं खड़ा है।

2006 में बिहार में एपीएमसी अधिनियम खत्म कर दिया गया था। लगभग 14 साल बीत जाने के बाद भी बिहार के किसानों को उपज बेचने के लिए अनुकूल बाजार नहीं मिल पाया और वे उसे निजी व्यापारियों को बेचने को मजबूर हैं। बिहार में 97 फीसदी सीमांत और छोटे किसान हैं। एक अर्थशास्त्री का कहना है कि बिहार के लगभग 94 फीसदी किसान ऐसे हैं जिन्हें कभी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) नहीं मिला। उनकी आर्थिक स्थिति में पिछले 14 साल में सुधार होने की बजाय उनकी हालत बिगड़ती ही चली गई है। इस बार भी बिहार के किसानों ने 900-1,000 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब धान बेचा है जबकि एमएसपी 1,868 रुपए है।

एपीएमसी अधिनियम को खत्म करने से पहले बिहार के किसान अपनी उपज बाजार समितियों को बेचते थे, जहां न्यूनतम मूल्य की गारंटी थी। लेकिन इस प्रणाली के निरस्त होने के बाद उन्हें ये देखने को भी नहीं मिली है। नतीजा, बिहार के किसान अब पंजाब और हरियाणा में मजदूरों के रूप में काम करते हैं। अकसर प्राथमिक कृषि ऋण सोसायटी (पैक्स) नमी का हवाला देकर किसानों से धान खरीदने से इनकार कर देती है। इसके अलावा पैक्स से उन्हें देरी से भुगतान मिलता है।

एक अनुमान के मुताबिक 1968-69 में गेहूं 76 रुपये प्रति क्विंटल में बेचा गया था, जबकि उस समय एक स्कूली शिक्षक का वेतन 70-80 रुपए था। पिछले पांच दशकों में शिक्षक का वेतन औसतन 70,000 रुपए तक बढ़ गया, लेकिन गेहूं का मूल्य 2,000 रुपये प्रति क्विंटल पर टिका हुआ है।

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