नई दिल्ली. धरती के सबसे पुराने नमक व्यापारियों में से एक बंजारे सदियों से खानाबदोश जिंदगी जी रहे हैं। अब वे बदलाव की राह हैं। न सिर्फ एक स्थान पर घर बसाकर रह रहे हैं, बल्कि बच्चों को पढ़ा—लिखा भी रहे हैं। पारंपरिक रूप से बंजारे काम धंधे और कारोबार की तलाश में एक जगह से दूसरी जगहों पर जाने वाले लोग हैं। अब वे पूरे देश में फैले हैं लेकिन उनकी जड़ें राजस्थान में हैं। आंध्र प्रदेश में उन्हें लंबाडा या लंबाडी कहते हैं जबकि कर्नाटक में लंबनी और राजस्थान में गवार या गवारिया।

अतीत में बंजारे बहुत से इलाकों में नमक और दूसरी जरूरी चीजें पहुंचाया करते थे। बंजारा शब्द वनज यानी व्यापार और जारा यानी यात्रा से बना है। उनकी भाषा गारबोली है, जो बहुत सारी भारतीय बोलियों के शब्दों से बनी है। अलग अलग इलाकों में गारबोली भी अलग अलग होती है।

बंजारा महिलाएं पहनावे और गहनों के कारण दूर से ही पहचान में आती हैं। वे सिक्कों या फिर स्टील और अन्य धातुओं से बने गहने पहनती हैं। वे सिर्फ नाक में सोने की लौंग पहनती हैं। कपड़े बहुत रंग बिरंगे होते हैं। महिलाएं कपड़े और गहने खुद ही बनाती हैं।

बंजारों को अलग अलग जगहों पर अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा या फिर गैर पत्रित जनजाति जैसी श्रेणियों में रखा गया है। बंजारे समाज में हाशिए पर जिंदगी गुजारने को मजबूर है। माना जाता है कि यूरोप के खानाबदोश रोमा लोग भी भारतीय बंजारों के वंशज हैं।

अब समुदाय के कुछ पुरुष एक जगह रहकर काम करने लगे हैं और अपने बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं, ताकि उनका भविष्य बेहतर हो सकें। कुछ साल पहले बंजारा समुदाय में महिलाओं की माहवारी और साफ सफाई से जुड़े विषयों पर कोई बात नहीं होती थी। लेकिन अब बंजारा समुदाय की महिलाओं के लिए कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

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