नई दिल्ली. पिछले कई दशक से पूर्वोत्तर में आतंक विरोधी अभियानों से जूझ रही पैरा मिलिट्री फोर्स असम राइफल्स सेना और आईपीएस अधिकारियों के बीच फुटबाल बन गई है। आईपीएस लॉबी फोर्स में आईपीएस अधिकारियों की तैनाती चाहती है लेकिन सेना इसका पुरजोर विरोध कर रही है।

सेना का कहना है कि अगर बल में आईपीएस अधिकारियों की नियुक्ति की गई तो इसकी लड़ाकू क्षमता पर विपरीत असर पड़ेगा। सेना चाहती है कि सैन्य प्रशिक्षण वाले इस बल का विलय उसमें कर दिया जाए जबकि आईपीएस लॉबी की कोशिश है कि बल की कमान उसी तरह आईपीएस अधिकारियों को सौंप दी जाए जैसे बीएसएफ, सीआरपीएफ इत्यादि बलों की कमान उनके पास है।

लगभग 185 वर्ष पहले 1835 में कछार लेवी नाम से गठित इस बल की शुरूआत महज 750 जवानों के साथ की गई।1870 में इसकी बटालियनों की संख्या बढ़ाकर इसका नाम असम मिलिट्री पुलिस कर दिया गया। इस बल के जवान ब्रिटिश सेना के साथ मिलकर प्रथम विश्वयुद्ध लड़ चुके हैं। कालांतर में इसे असम राइफल्स नाम मिल गया। इस बल में 46 बटालियन के 65,000 जवान और अधिकारी हैं। 1962 में चीन के साथ लड़ाई के बाद ये सेना के नियंत्रण में चली गई।

यहां बता दें कि इस बल पर कब्जे की लड़ाई लम्बे समय से चल रही है। सेनाधिकारी चाहते हैं कि असम राइफल्स का विलय सेना में कर दिया जाए। लेकिन गृहमंत्रालय में प्रभावी आईपीएस लॉबी का मानना है कि तमाम अर्धसैनिक बल गृहमंत्रालय के अधीन हैं, इसलिए असम राइफल्स पर भी उसी का नियंत्रण होना चाहिए।

वैसे कमान के स्तर पर असम राइफल्स में लगभग 80 फीसदी अधिकारी सेना से आते हैं। पूर्वोत्तर में कानून व व्यवस्था की की निगरानी और उग्रवाद-विरोधी अभियानों में ये बल सेना के साथ मिल कर काम करता है।

सेना की पूर्वी कमान के अनुसार अगर असम राइफल्स गृह मंत्रालय के अधीन चला गया तो इसमें सैन्य अधिकारियों की नियुक्ति नहीं हो पाएगी। इससे बल की मारक क्षमता कम हो जाएगी। पूर्वोत्तर में उग्रवाद-विरोधी अभियानों को भी झटका लगेगा।

सेना का कहना है कि आईपीएस अधिकारी लड़ाई या उग्रवाद-विरोधी अभियानों के लिए प्रशिक्षित नहीं होते लिहाजा उनकी नियुक्ति से बल की क्षमता को नुकसान होगा। असम राइफल्स के महानिदेशक सेना के अधिकारी होते हैं।

सेना का मानना है कि इससे भारत के सीमा प्रबंधन, पूर्वोत्तर भारत के सुरक्षा परिदृश्य और भारत-चीन सीमा की निगरानी पर इसका नकारात्मक असर पड़ने के साथ ही भारत-म्यांमार सीमा की सुरक्षा भी प्रभावित होगी।

वैसे असम राइफल्स पर नियंत्रण के लिए सेना और केंद्रीय गृह मंत्रालय की खींचतान बहुत पुरानी है। 2009 में आईटीबीपी में इसके विलय का प्रस्ताव कैबिनेट की सुरक्षा समिति के समक्ष आ चुका है, लेकिन समिति ने इसे खारिज कर दिया था। 2013 में भी गृह मंत्रालय असम राइफल्स का विलय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में करने का प्रस्ताव ला चुका है, लेकिन प्रस्ताव सिरे नहीं चढ़ पाया।

केन्द्रीय गृहमंत्री पद पर 2019 में अमित शाह की ताजपोशी के बाद असम राइफल्स का विलय आईटीबीपी में करने की योजना बनाई गई है। फिलहाल ये मामला सुरक्षा मामलों की कैबिनट समिति के पास लम्बित है।

Leave a comment

Your email address will not be published.