नई दिल्ली. जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट की शरण में पहुंचे रिपब्लिक टीवी के प्रमुख सम्पादक अर्नब गोस्वामी ने आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट पीठ के समक्ष महाराष्ट्र सरकार की मशीनरी पर सवाल खड़े किए हैं। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी की खंडपीठ याचिकाकर्ताओं अर्नब, नीतीश शारदा और परवीन राजेश की अंतरिम जमानत बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा ठुकराये जाने के फैसले के खिलाफ अपील की सुनवाई कर रही है।

अर्नब गोस्वामी की ओर से पेश हरीश साल्वे ने मुंबई पुलिस की ज्यादती और राज्य की मशीनरी के दुरुपयोग का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि अर्नब के खिलाफ प्राथमिकी पांच मई 2018 को दर्ज की गयी थी। मसला यहां यह है कि मामले की फिर से जांच की शक्ति का दुरुपयोग किया गया। इसके समर्थन में उन्होंने क्लोजर रिपोर्ट पढ़कर खंडपीठ को सुनाई।
साल्वे ने कहा कि अन्वयक नायक और उसकी मां कुमुद की आत्महत्या अर्नब के उकसावे के कारण नहीं हुई, बल्कि उन्होंने आर्थिक तंगी में आत्महत्याएं की। उन्होंने हाल के दिनों में अर्नब के खिलाफ कई तरह के मामले दर्ज करने का भी लेखा-जोखा प्रस्तुत किया।

मामला व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित

पीठ ने बुधवार को पत्रकार अर्नब गोस्वामी के खिलाफ आत्महत्या के लिये उकसाने के 2018 के मामले में महाराष्ट्र सरकार पर सवाल उठाये और कहा कि इस तरह से किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत आजादी पर बंदिश लगाया जाना न्याय का मखौल होगा। पीठ ने राज्य सरकार से जानना चाहा कि क्या गोस्वामी को हिरासत में लेकर उनसे पूछताछ की कोई जरूरत थी क्योंकि यह व्यक्तिगत आजादी से संबंधित मामला है।

मैं नहीं देखता उनका चैनल: न्यायमूर्ति चंद्रचूड

पीठ ने टिप्पणी की कि भारतीय लोकतंत्र में असाधारण सहनशक्ति है और महाराष्ट्र सरकार को इन सबको (टीवी पर अर्नब के ताने) नजरअंदाज करना चाहिए। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, उनकी जो भी विचारधारा हो, कम से कम मैं तो उनका चैनल नहीं देखता लेकिन अगर सांविधानिक न्यायालय आज इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा तो हम निर्विवाद रूप से बर्बादी की ओर बढ़ रहे होंगे। सवाल ये है कि क्या आप इन आरोपों के कारण व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत आजादी से वंचित कर देंगे। शीर्ष अदालत 2018 के एक इंटीरियर डिजायनर और उनकी मां को आत्महत्या के लिये कथित रूप से उकसाने के मामले में अंतरिम जमानत के लिये गोस्वामी की अपील पर सुनवाई कर रही है। गोस्वामी ने बंबई उच्च न्यायालय के नौ नवंबर के आदेश को चुनौती दी है जिसमें उन्हें और दो अन्य को अंतरिम जमानत देने से इंकार कर दिया था और उन्हें राहत के लिये निचली अदालत जाने का निर्देश दिया गया था।

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