अगर किसी भाजपा नेता से रिकार्ड पर ये पूछा जाए कि क्या कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा सफल है तो वह उसमें जुटी भीड़ को तमाशबीन कहकर उसके असर से मुंह मोडने की कोशिश करेगा लेकिन दिल्ली में हुई भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की दो दिवसीय बैठक में पार्टी के सर्वोच्च लीडर नरेन्द्र मोदी का सम्बो​धन बता रहा है कि भाजपा राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के असर और अपने वोट बैंक में महंगाई तथा बेरोजगारी से बढ़ रही बैचेनी से अनभिज्ञ नहीं है.

दूसरे शब्दों में कहें तो भाजपा को डर है कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान उठाए गए महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी और धनवानों से मित्रता के मुद्दे अगर चुनाव तक चर्चा के केन्द्र में आ गए तो उसका चुनावी रथ हिचकोले खा सकते हैं. इसीलिए प्रतीकों की राजनीति करने में माहिर भाजपा ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक स्थल के गेट पर मंदिरों, सुभाष चंद्र बोस और सरदार वल्लभ भाई पटेल की तस्वीरों वाला एक बड़ा-सा कट आउट लगा लगा रखा था. ये शायद इस बात का इशारा था कि इस साल नौ राज्यों में होनेवाले चुनाव और फिर 2024 आम चुनावों में ‘मंदिर और राष्ट्रवाद’ की पटरी पर दौडकर भाजपा चुनाव जीतने की कोशिश करेगी.

लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सम्बो​धन ने राजनीतिक जानकारों को तब हैरान कर दिया जब उन्होंने अल्पसंख्यकों को कोसने और उन्हें हाशिये पर धकेलने के अभियान को विराम देते हुए उन्हें फिर से मुख्यधारा में शामिल करने का आदेशात्मक सुझाव कार्यकर्ताओं और पार्टी नेताओं को दिया. लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव अभियानों के बीच मोदी खुलकर समुदाय विशेष को इशारों में निशाना बनाकर ध्रुवीकरण करते रहे हैं. ध्रुवीकरण के लिए वे विभिन्न प्रतीकों का इस्तेमाल करते रहे हैं.

भाजपा की चुनावी रणनीति पर पैनी नजर रखने वालों का अनुमान है कि साल 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के लिए जी तोड़ कोशिश करेगी और स्वयं मोदी के साथ ही उनके खास सिपहसालार अमित शाह को ये आभास है कि वे दो चुनावों में हिंदू वोट बैंक का अधिकतम दोहन कर चुके हैं और अब वह वोट बैंक महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर दबी जुबान से चर्चा करने लगा है.

ये चर्चा ना तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सुहाती है और ना ही उनके पदचिन्हों को फॉलो कर रहे पार्टी संगठन को पसंद आती है. क्योंकि इन मुद्दों पर चुनाव लड़ा गया तो पार्टी और उसके नेतृत्व के पास कहने के लिए कुछ भी नहीं है. यानी ये मुद्दे पार्टी की कमजोर नस हैं और कांग्रेस नेता राहुल गांधी इसी नस को पिछले पांच महीने से कन्याकुमारी से पंजाब तक लगातार दबाते आ रहे हैं.

जानकारों का अनुमान है कि अगर हिंदू वोट बैंक महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे पर मुखर हो गया तो पार्टी का तीसरी बार केन्द्र में सरकार बनाने का स्वप्न धूल धूसरित हो सकता है. इसलिए पार्टी चाहती है कि वह भारत के उस दक्षिणी हिस्से से कम से कम पचास सीट लेकर आए जहां कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का खासा असर​ दिख रहा है. दक्षिण के राज्यों में जिस तरह सभी वर्गों की भीड़ उमड़ी, उसने साफ कर दिया कि अगर हालात को सम्भाला नहीं गया तो दक्षिण का कर्नाटक न​ सिर्फ उसके हाथ से निकल सकता है बल्कि कांग्रेस को लोकसभा में सौ सीट के आसपास पहुंचा सकता है.

इसलिए पार्टी उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में अलग—अलग रणनीति के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी. पूर्व में बंगाल समेत घुसपैठ पीड़ित राज्यों में वह हिंदुत्व के नरेटिव को बरकरार रखेगी. पश्चिमी राज्यों विशेषकर महाराष्ट्र और गुजरात में भी इसी राह पर वोट मांगा जाएगा. दक्षिण में वह अल्पसंख्यकों के खिलाफ नकारात्मक अभियान को विराम दे सकती है और उत्तर में उसका अभियान हिंदुत्व की अपेक्षा राष्ट्रवाद यानी सुभाष चन्द्र बोस और सरदार पटेल को आगे रखकर सेनाओं को मजबूत करने का राग अलाप सकती है.

भाजपा पर लगातार नजर रखने वाले दिल्ली के एक वरिष्ठ पत्रकार का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह अल्पसंख्यकों के बीच जाकर काम करने का आदेशात्मक सुझाव पार्टी को दिया, उसने ये साफ कर दिया कि पार्टी और उसके नेतृत्व को दिख रहा है कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा ने हिंदुत्व के नशे में डूबे वोट बैंक को बेरोजगारी और महंगाई से हो रही परेशानी को याद दिला दिया है.

इसलिए पार्टी धीरे से समन्वय के रास्ते पर आगे बढ़ने का संकेत देकर मध्यमार्गी अल्पसंख्यकों के मन में बैठे भय को दूर करने का साफ्ट प्रयास करेगी. नरेंद्र मोदी की बीजेपी अंतरिक्ष विज्ञान में भारत की प्रगति और सुरक्षा को भी केंद्र में रखकर चुनावी रणनीति को फिर से बुनेगी.

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