नई दिल्ली. उत्तरभारत की राजनीति के विश्लेषण में मशगूल रहने वाले विश्लेषकों का ध्यान अब उत्तरपूर्व के दूसरे अमित शाह पर केन्द्रित है। एक-एक कर छह राज्यों में भाजपा को सिंहासन दिलाने वाला ये चुनावी चाणक्य और कोई नहीं बल्कि वह हेमंत विस्वा सरमा है जिसे कांग्रेस नेतृत्व ने पार्टी से बाहर जाने को मजबूर कर दिया था। उसी हेमंत विस्वा सरमा ने फिर एक बार असम में भाजपा की ताकत को परवान पर पहुंचा दिया है।

उनकी बनाई चुनावी रणनीति के चलते बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद के लिए दो चरणों में 7 और 10 दिसंबर को हुए मतदान में भाजपा 40 में से 9 पर जीत हासिल कर किंगमेकर बन गई है। जबकि 2015 में उसे यहां एक ही सीट मिली थी।
बोडोलैंड काउंसिल चुनावों में भाजपा के सफल प्रदर्शन से सरमा फिर एक बार पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की जरूरत बनकर उभरे हैं। वे चुनावी दृष्टि से नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बाद पार्टी के सर्वाधिक चतुर शख्सियत बन गए हैं।

असम में मंत्री के रूप में वित्त, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभालने वाले सरमा कठिन परिस्थितियों में भी सफल चुनावी अभियानों का नेतृत्व करने की अपनी क्षमता तथा प्रशासन और शासन के अपने अनुभवों के कारण बाकियों से आगे नज़र आते हैं। बाहरी होने के बावजूद वह भाजपा की ध्रुवीकरण की राजनीति में पूरी तरह फिट बैठते हैं।

आदिवासी और स्थानीय समुदायों के वर्चस्व वाले बोडो क्षेत्र के चुनाव को अगले साल विधानसभा चुनावों से पहले सेमीफाइनल माना जा रहा है। इस चुनाव में ज़ोरदार परिणाम हासिल कर भाजपा ने दिखा दिया कि उसे असम में किसी सहयोगी की आवश्यकता नहीं है।

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस और छोटे क्षेत्रीय दलों के प्रभुत्व वाले पूर्वोत्तर में भाजपा अनाम पार्टी थी। फिर मोदी-शाह के समर्थन से सरमा ने एक-एक कर राज्यों पर कब्जा करना शुरू किया और देखते ही देखते भाजपा पूर्वोत्तर के सात राज्यों में से छह में सत्तारूढ़ हो गई। यहां तक कि वामपंथियों को उनके गढ़ त्रिपुरा में सत्ता से बेदखल करने की कठिन लड़ाई भी उसने जीत ली। हालांकि असम के स्वास्थ्य मंत्री हेमंत विस्वा सरमा का कोविड प्रबंधन सवालों के घेरे में रहा लेकिन मोदी और अमित शाह की तरह वह कमियों को ढंककर राजनीतिक जुमलों के सहारे बाकी बातों को पीछे छोड़ना सीख गए हैं।

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