नई दिल्ली. देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई में शिशुओं के कारोबार ने जड जमा ली हैं। इस कारोबार में कुछ अस्पतालों की नर्स और अन्य चिकित्सकीय स्टाफ की भागीदारी के संकेत मिले हैं। ये नर्स और चिकित्सकीय स्टाफ गरीब गर्भवतियों से सम्पर्क कराकर बच्चों की खरीद बिक्री कराते हैं। इसके लिए वे लाखों की वसूली करते हैं।

मुम्बई पुलिस ने ऐसे ही एक शिशु चोर गिरोह का पर्दाफाश किया है। पुलिस ने गिरोह के नौ सदस्यों को शिशुओं की तस्करी के आरोप में चिन्हित किया है। इनमें एक मैटरनिटी अस्पताल में काम करने वाली एक नर्स और एजेंट भी शामिल हैं। गिरफ्तार नौ आरोपियों ने बीते छह साल में सात बच्चों की खरीद-फरोख्त की है। पुलिस ने इसके अलावा तीन शिशुओं की मां और बच्चे को खरीदने वाले एक व्यक्ति को भी गिरफ्तार किया है। पुलिस जांच कर रही है कि गिरोह ने कितने बच्चे बेचे। यह पड़ताल भी की जा रही है कि कितने और एजेंट ऐसा ही काम कर रहे हैं?

पुलिस ने तस्करी विरोधी और जुवेनाइल जस्टिस कानूनों के तहत नौ लोगों पर बच्चों की खरीद-फरोख्त के आरोप तय किए हैं। बच्चों को बेचने वाली माताएं बहुत गरीब हैं जबकि उन्हें खरीदने वाले लोग बच्चे के लिए बेताब थे। शुरुआती जांच से पता चला है कि गिरोह के सदस्य बांद्रा कुरला कॉमप्लेक्स के पास झुग्गी बस्तियों में रहने वाली गरीब गर्भवती महिलाओं को निशाना बनाते थे। फिर अस्पताल में काम करने वासी नर्स बिना बच्चे वाले जोड़ों का संपर्क इन गर्भवती महिलाओं से कराती थी। आरोप है कि संपर्क कराने के लिए यह नर्स बच्चों के लिए तरसने वाले लोगों से एक लाख तक वसूलती थी।

लड़कियों को 70 हजार रुपये में और लड़कों के लिए डेढ़ लाख तक वसूले गए। इससे पहले मुंबई पुलिस ने 2016 में पांच महिलाओं को गिरफ्तार किया था जिन पर इसी तरह अपने बच्चों को बेचने के आरोप थे। भारत में वर्ष 2019 में बच्चों की तस्करी से जुड़े 1,100 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए। 2018 में ऐसे मामलों की संख्या 1,000 के आसपास थी। लेकिन तस्करी के खिलाफ काम करने वाली संस्थाओं का कहना है कि यह आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि बच्चों की तस्करी में हो रही वृद्धि के कारण उन बच्चों की संख्या घट रही है जिन्हें गोद लिया जा सके। बिना बच्चों वाले बहुत से माता-पिता को इंतजार करना पड़ रहा है।

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