नई दिल्ली. सितम्बर के आखिरी सप्ताह से भिड़ रहीं आर्मीनिया और अज़रबैजान की फौजों को युद्व से विमुख करने के लिए रूसी शांतिसेना पहुंच गई है। लड़ाई में बढ़ता बना रहे अज़रबैजान की सेना ने हाल ही नागोर्नो-काराबाख़ के शुशा (आर्मीनिया में शुशी) शहर पर कब्ज़ा कर लिया था। अब अज़रबैजान की नज़र काराबाख़ की राजधानी स्तेप्नाकियर्त पर थी।

रूस ने दख़ल देकर दोनों देशों के बीच शांति समझौता कराकर स्तेप्नाकियर्त में शांति सेना भेज दी है। आर्मीनिया, अज़रबैजान और रूस के नेताओं की ऑनलाइन मुलाक़ात में नागोर्नो-काराबाख़ में संघर्ष ख़त्म करने के लिए नौ सूत्री समझौते की रूपरेखा बनी। तीनों नेताओं ने सहमति जताई कि आर्मीनिया की सेना नागोर्नो-काराबाख़ के आसपास बचे हुए कब्ज़े वाले इलाक़ों से पीछे हट जाएगी। इन पर अज़रबैजान का फिर से नियंत्रण हो जाएगा। रूस की शांति सेना दोनों सेना को अलग-अलग करेगी।

रूसी सेना नागोर्नो-काराबाख़ के आर्मीनेयाई लोगों को मुख्य आर्मीनिया से जोड़ने वाले पांच किलोमीटर चौड़े गलियारे को सुरक्षित बनाएगी। सोवियत संघ के विघटन के बाद दोनों देशों के बीच बढ़ती राष्ट्रीय पहचान ही नागोर्नो-काराबाख़ की लड़ाई की वजह बनी है। अज़रबैजान और आर्मीनिया ने लड़ने के लिए सोवियत सेना के छोड़े गए हथियारों का इस्तेमाल किया। 1994 के अंत तक उसने नागोर्नो-काराबाख़ और उसके आसपास के अज़रबैजान के सात इलाक़ों पर नियंत्रण पा लिया था। इससे एक-दूसरे देशों के लोगों को निकाले जाने से करीब एक लाख शरणार्थी पैदा हो गए। दोनों देशों के बीच हमेशा तनाव रहा।
कैस्पियन सागर में मिले तेल और गैस के स्रोत अज़रबैजान के लिए वरदान बनकर आए और इस तेल व गैस बेचकर अज़रबैजान ने खूब पैसा कमाया। अज़रबैजान की सरकार ने सेना को मजबूत करने में इस पैसे का इस्तेमाल किया। बेहतर टैंक, गोला-बारूद और खासतौर पर नई तकनीक ख़रीदने में अरबों डॉलर खर्च किए।

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