नई दिल्ली. अमेरिका को अफगानिस्तान से फौज हटाने की आखिर इतनी जल्दी क्यों है? इस सवाल का जवाब अमेरिका के मित्र देशों के साथ ही वे बीस लाख अफगानी ढूंढ रहे हैं, जो तालिबानी शासन के दौरान पड़ोसी पाकिस्तान में शरणार्थी के तौर पर जीने को अभिशप्त हैं।

खूरेंजी से भरा हुआ है इतिहास

अस्सी के दशक में दुर्जेय मानी जाने वाली रूसी फौजों को घुटने टिकवा चुके अफगानिस्तान के इतिहास में इस सवाल का जवाब छुपा हुआ है। एशिया का दुर्गम इलाका माने जाने वाले अफगानिस्तान का इतिहास खूंरेजी से भरा हुआ है। वहां विधिवत शासन बहुत कम समय तक रह पाया है।

असल में वहां के लड़ाकू कबीले इसका मुख्य कारण हैं। वे खुदमुख्तार रहना पसंद करते हैं। जब कभी कोई उन पर शासन करने का प्रयास करता है तो वे हथियार उठा लेते हैं। नतीजा आज तक कोई भी विदेशी शक्ति सैनिक ताकत के बूते उन्हें झुका नहीं पाई और पहले सोवियत संघ और अब अमेरिका वहां से निकलने के लिए मजबूर हुआ है।

मजबूत हो सकता है आईएसआईएस

सुरक्षा विशेषज्ञों को आशंका है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों के हटने के बाद वहां हिंसा बढ़ सकती है। इस्लामिक स्टेट और उससे जुड़े आतंकवादी संगठन मजबूत हो सकते हैं। अमेरिका और तालिबान के बीच समझौते में सैनिकों को धीरे धीरे हटाने की बात कही गई थी। सैनिकों को अप्रैल तक अफगानिस्तान छोड़ना था। लेकिन लगभग 2,500 अमेरिकी सैनिक जनवरी तक अफगानिस्तान छोड़ देंगे। इसके बाद अफगानिस्तान में दो हजार सैनिक बचे रह जाएंगे।

मीडिया की खबरों के मुताबिक अमेरिका ने यह सोच कर तालिबान के साथ डील की थी कि कहीं अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट का विस्तार ना हो। सीरिया और इराक में तथाकथित खिलाफत गंवाने के बाद इस्लामिक स्टेट विस्तार के लिए नई जमीन तलाश रहा है। अमेरिका ने 11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमले के बाद अफगानिस्तान पर हमला कर तालिबान को सत्ता से बेदखल किया था। तालिबान सरकार ने अल कायदा के मुखिया ओसामा बिन लादेन को शरण दे रखी थी।

तालिबान का साथ देता है पाकिस्तान

पश्चिम देशों के सैन्य संगठन नाटो के अफगानिस्तान में 12 हजार सैनिक हैं जो अफगान सुरक्षा बलों को ट्रेनिंग और सलाह मशविरा देते हैं। इसमें तीस देशों के सैनिक शामिल हैं जो यातायात, लॉजिस्टिक और अन्य मदद के लिए अमेरिकी सेना पर निर्भर हैं।

अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों को हटाने के फैसले पर पाकिस्तान की नजरें भी टिकी हैं। अफगानिस्तान का आरोप है कि पाकिस्तान तालिबान का साथ देता है और उसके नेताओं को अपने यहां शरण देता है। वहीं पाकिस्तान का कहना है कि उसे निशाना बनाकर किए जाने वाले भारत समर्थित हमलों के लिए अफगानिस्तान जमीन मुहैया करा रहा है। पाकिस्तान में लगभग बीस लाख अफगान शरणार्थी रहते हैं।

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