इसी कारण चीनी मिलों पर हजारों करोड़ का कर्ज

नई दिल्ली. भारत ने विश्व व्यापार संगठन की एक शर्त से निजात पाने का रास्ता खोज लिया है। संगठन की शर्त है कि भारत चीनी निर्यातकों को 2023 के बाद वित्तीय सहायता नहीं दे पाएगा। सरकार ने इसके लिए रास्ता निकाला है कि वह पहली पीढ़ी के इथेनॉल का उत्‍पादन बढ़ाने के लिए चावल, गेहूं, जौ, मक्‍का और जवार, गन्‍ना, चुकन्‍दर आदि से इथेनॉल निकालने की क्षमता को बढ़ा देगा जिससे चीनी मिलों को अतिरिक्त चीनी का उत्पादन नहीं करना पड़ेगा।

देश में अभी चीनी की सालाना खपत 260 मीट्रिक टन और उत्पादन 320 मीट्रिक टन होने से अतिरिक्त उत्पादन को निर्यात करना पड़ता है। इस निर्यात पर केन्द्र सरकार चीनी मिलों को वित्तीय सहायता देती है। विश्व व्यापार संगठन से समझौते के चलते केन्द्र सरकार 2023 तक ही चीनी मिलों को वित्तीय सहायता दे सकती है।

इसके लिए आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति ने ईंधन में जैव ईंधन मिश्रण स्‍तर में वृद्धि को मंजूरी दे दी है। इससे एक तरफ आयातित जैव ईंधन पर खर्च होने वाला डालर बचेगा बल्कि भट्टियों की क्षमता में वृद्धि/नई भट्टियां लगाने से रोजगार के नए अवसर सृजित हो सकेंगे।

सामान्‍य चीनी सत्र में करीब 320 लाख टन चीनी के उत्‍पादन के मुकाबले घरेलू खपत सिर्फ 260 लाख टन है। 60 लाख टन के अतिरिक्‍त उत्‍पादन से चीनी मिलों को कीमत तय करने में दबाव का सामना करना पड़ता है। 60 लाख मीट्रिक टन का यह अतिरिक्‍त भंडार बिक नहीं पाता और इससे चीनी मिलों की 19 हजार करोड़ रुपए की राशि फंस जाती है। इससे वे गन्‍ना किसानों को उत्‍पाद की बकाया राशि का भुगतान नहीं कर पाती।

सरकार का मानना है कि अतिरिक्‍त गन्‍ने और चीनी का इथेनॉल उत्‍पादन के लिए उपयोग करना ही चीनी के अतिरिक्‍त भंडार से निपटने का एकमात्र रास्‍ता है। अतिरिक्‍त चीनी के उपयोग से चीनी के घरेलू मिल-मूल्‍य में स्थिरता आएगी और चीनी मिलों को उसके भंडारण की समस्‍या से भी निजात मिल जाएगी। इससे उनके पूंजी प्रवाह में सुधार होगा और उन्‍हें किसानों को बकाया मूल्‍य का भुगतान करने में सुविधा हो जाएगी।

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