इस कदम से हल होगा भारत-चीन सीमा विवाद, पूर्व सेनाधिकारी की सलाह

नई दिल्ली. एक पूर्व सेनाधिकारी ने सरकार को सलाह दी है कि चीन से निपटने के लिए भारत को तिब्बत पर चीनी कब्जे को दी गई मान्यता को वापस लेनी चाहिए। भारत का ये एक कदम ही चीनी अधिनायकवाद को पड़ोसियों को धमकाने से रोक सकता है।

मेजर जनरल (रिटायर्ड) अशोक के मेहता ने एक लेख लिखकर सरकार से कहा है कि पूर्वी लद्दाख में गतिरोध के बाद भारत ने अब तक चीन को बराबरी का जवाब देने के लिए कोई ठोस रणनीति नहीं बनाई है। अब समय आ गया है कि भारत चीन के साथ सख्ती से पेश आए और तिब्बत के कार्ड का इस्तेमाल करे। भारत का सीमा विवाद तिब्बत से आंतरिक रूप से जुड़ा हुआ है। चीन तिब्बत विवाद असल में चीन भारत विवाद का ही हिस्सा है।

अब इस विवाद से निपटने का वक्त आ गया है। सबसे पहले भारत को यह कहना बंद करना होगा कि तिब्बत चीन का हिस्सा है। उसे खुलकर ये कहना चाहिए कि तिब्बत इंपीरियल चाइना या मंगोल साम्राज्य का हिस्सा कभी नहीं था। मैकमोहन लाइन के जरिए भारत तिब्बत सीमा 1914 में हल कर ली गई थी और तिब्बत ने इसे मंजूर भी किया था।

तिब्बत भारत और चीन के बीच बफर स्टेट था। तिब्बती चीन के अल्पसंख्यक नहीं हैं। भारत तिब्बत को चीन का हिस्सा बताना बंद करे। भारत को दलाई लामा को भारत रत्न देना चाहिए। उन्हें सरकारी विशेषाधिकार देकर अरुणाचल प्रदेश सहित पूरे देश में आजादी से यात्रा की अनुमति दी जाए।

सेंट्रल तिब्बत एडमिनिस्ट्रेशन को निर्वासित सरकार के रूप में मान्यता और समर्थन वापस लिया जाए। नई दिल्ली में चीन के दूतावास के सामने पंचशील मार्ग के नाम को बदलकर दलाई लामा मार्ग किया जाना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की दो वर्षीय अध्यक्षता 2021 में शुरू होते ही इस विषय को उठाया जाए। तिब्बत के मुद्दे को आतंकवाद पर संयुक्त राष्ट्र के ड्राफ्ट कनवेंशन का हिस्सा बनवाया जाए। तिब्बत में बौद्ध धर्म और संस्कृति पर अध्ययन को विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम और थिंक टैक्स में शुरू किया जाए।

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