नई दिल्ली. अगर धरती पूरी तरह ठंडी नहीं होती तो प्रागैतिहासिक काल की शार्क आज के समुद्रों में व्हेल का नामो-निशान मिटा देती क्योंकि उस वक्त की शार्क मछली 18 मीटर तक लम्बी और हजारों टन वजनी होती थी।

वह अपने बच्चों को 25 साल तक सागर के छिछले पानी में पालती थी। इस गर्म छिछले पानी में शार्क के बच्चों के लिए हर समय भोजन अर्थात छोटी मछलियां उपलब्ध रहती थीं। व्हेल को निगल जाने वाली इन शार्क मछलियों का नाम ओटोडस मेगलोडोंस था और धरती के पूरी तरह ठंडी होने पर जब सागर का जलस्तर घटा तो वे काल के गाल में समा गईं। शार्क मछलियों के उद्भव और समाप्त हो जाने के कालखंड की कहानी को रॉयल सोसायटी के बायोलॉजी लेटर्स जर्नल ने छापा है।

तकरीबन 30 लाख साल पहले विशालकाय शार्कों के लुप्त होने तक समुद्र में उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था। वह छोटी शार्कों के साथ ही व्हेल खाकर जीवन-यापन करती थी।

हालांकि बचपन में इन शार्कों को रेजर जैसे धारदार दांतों वाली अन्य शार्क का खतरा रहता था, लेकिन वे मुश्किल से छिछले सागर तक आती थीं। अन्य शिकारी भी छिछले पानी से दूर ही रहते थे। स्पेन के तारागोना प्रांत में पूर्वी तट से कुछ दूर ऐसे इलाके मिले हैं जो प्रागैतिहासिक काल में छिछले पानी के क्षेत्र थे।

शोधकर्ताओं ने शार्क के दांतों के उन आठ सेटों का विश्लेषण किया जो अमेरिका, पेरू, पनामा और चिली में मिले। इनमें चार दांत वयस्क शार्कों के हैं और माना जा रहा है कि वे उन इलाकों में मिले जहां शार्क प्रजनन और भोजन करने के लिए रहती थीं। शार्क अपने जीवनकाल में निरंतर दांत गिराती रहती हैं। इसलिए इनके जीवाश्म मिलना आसान है।

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