नई दिल्ली. पूरी दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचा रहा सोशल मीडिया उसी अमेरिकी कानून के शिंकजे में फंस गया है जिसके चलते उसे भीमकाय होने में मदद मिली थी। फेसबुक, ट्विटर और गूगल इन दिनों अमेरिकी सीनेट की कामर्स कमेटी का सामना कर रहे हैं। इस कमेटी के समक्ष रिपब्लिकन पार्टी ने रुढ़िवाद विरोधी होने का आरोप लगाया है तो डेमोक्रेटिक पार्टी फेक न्यूज और नफरत फैलाने वाले संदेशों को नहीं रोक पाने से फेसबुक की मुश्कें कसना चाहती है।

26 शब्दों की ताकत है फेसबुक, गूगल के पीछे

असल में 1996 में अमेरिका के दूरसंचार से जुड़े कानून में 26 ऐसे शब्द जोड़े गए जिन्होंने फेसबुक, ट्विटर और गूगल जैसी कंपनियों को उभरने का मौका दिया। कानून इंटरनेट पर भेदभाव या सेंसरशिप से मुक्त भाषण या संदेशों का आधार है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के प्रशासन ने इन्हें कार्यकारी आदेश के जरिए सीधे चुनौती दी है। इनमें से एक आदेश ऑनलाइन प्लेटफार्मों संपादकीय फैसलों पर मिलने वाला संरक्षण उनसे छीन लेगा। दोनों अमेरिकी पार्टियों में ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि सेक्शन 230 सोशल मीडिया कंपनियों को निष्पक्ष रह कर नियंत्रित करने की जिम्मेदारी से मुक्त करता है।

ये है सेक्शन 230

अगर कोई समाचार एजेंसी आप पर झूठा आरोप लगाती है तो आप उसके खिलाफ मुकदमा कर सकते हैं लेकिन अगर यही बात कोई फेसबुक पर लिखी पोस्ट में कहता है तो आप फेसबुक को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। सेक्शन 230 में यही कहा गया है। आप पोस्ट डालने वाले व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा कर सकते हैं, फेसबुक के खिलाफ नहीं। सोशल मीडिया कंपनियों के अधिकारियों का कहना है कि इस सुरक्षा ने ही इंटरनेट को इस मुकाम तक पहुंचाया है। सोशल मीडिया कंपनियां करोड़ों लोगों के संदेश अपने प्लेटफॉर्म पर रख सकती हैं और इसके लिए उन पर कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती। सेक्शन 230 की कानूनी व्याख्या सोशल मीडिया प्लेटफार्मों को इस बात का भी अधिकार देती है कि वे अपनी सेवाओं को नियंत्रित करने के लिए उन पोस्ट को हटा सकती हैं जो अश्लील है या फिर उनकी सेवा मानकों के स्तर का उल्लंघन करती है।

कैसे अस्तित्व में आया सेक्शन 230

तकरीबन 70 साल पहले 1950 के दशक में किताब की एक दुकान के मालिक पर अश्लील सामग्री वाली किताबें बेचने के लिए मुकदमा चलाया गया। इसमें सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया कि किसी और की सामग्री के लिए किसी और को दोषी ठहराया गया है। व्यवस्था दी गई कि मुकदमा दायर करने वाले को यह साबित करना होगा कि किताब बेचने वाला इस बात को जानता था कि इसमें अश्लील सामग्री है।

इसके कुछ दशकों के बाद जब कारोबारी इंटरनेट ने पंख फैलाना शुरू किए तो कॉम्पुसर्व और प्रोडिजी नाम की दो सेवाएं चालू हुईं। दोनों ऑनलाइन फोरम थे लेकिन कॉम्पुसर्व ने इसे नियंत्रित नहीं करने का फैसला किया जबकि प्रोडिजी ने ऐसा किया क्योंकि वह पारिवारिक छवि बनाना चाहती थी। कॉम्पुसर्व के खिलाफ जब मुकदमा हुआ तो उसे खारिज कर दिया गया लेकिन प्रोडिजी मुसीबत में आ गई। तब जज ने इस मामले में फैसला दिया कि संपादकीय नियंत्रण रखकर आप एक अखबार की तरह काम कर रहे हैं ना कि अखबार का स्टॉल चला रहे हैं। इसी के साथ सेक्शन 230 बनाया गया और कंपनियों को ना सिर्फ यूजर पोस्ट की जिम्मेदारी बल्कि उन्हें नियंत्रित करने के मामले में भी कानूनी सुरक्षा मिल गई

सेक्शन 230 हटाने का ये होगा असर

सोशल मीडिया कंपनियों का आधार ही यूजर कंटेंट है। अगर उन्हें उसके लिए दोषी ठहाराया जाने लगा तो वे अपने प्लेटफॉर्म पर उसे डालना बंद कर देंगे और ऐसी कंपनियों के अस्तित्व पर संकट आ जाएगा। भारत में भी सोशल मीडिया को लेकर आए दिन सवाल उठ रहे हैं। भारत में फेसबुक की नीति प्रमुख आंखी दास ने इस्तीफा दे दिया। उन पर सत्ताधारी पार्टी के साथ नरमी बरतने के आरोप लगे थे। आरोप यह था कि सत्ताधारी पार्टी के समर्थकों ने फेसबुक के नफरती भाषण से जुड़े कानूनों का उल्लंघन कर मुस्लिम विरोधी पोस्ट डाले और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। हालांकि कंपनी ने इससे इनकार किया। कंपनी के सीईओ की संसदीय पैनल के सामने पेशी भी हुई थी।

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