नई दिल्ली. व्यापारी डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव हार जाने से भले ही अमेरिकी दक्षिणपंथी हताश हों लेकिन उनकी हताशा से इतर मौजूदा दौर में अमेरिका के सबसे बड़ा दुश्मन चीन चिंताओं के ऐसे सागर में डूबा हुआ है, जहां से तैरकर निकल जाने का उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है।

चीन की चिंता का सबसे बड़ा कारण जो बाइडेन का व्यापारी नहीं होना और मध्यमार्गी होना है। चीन का मानना है कि दक्षिणपंथी व्यापार के लिए पर्यावरण और मानवाधिकारों की परवाह नहीं करते। यही कारण था कि ट्रंप के चार साल के कार्यकाल में चीन पर्यावरणीय चिंताओं को दरकिनार करने के साथ ही मानवाधिकारों को कुचलते हुए दिनोंदिन ताकतवर होता चला गया।

चीन की कमजोर नस हैं पर्यावरणीय और मानवाधिकार

फिलहाल चीन मान रहा है​ कि जो बाइडेन प्रशासन से भिड़ना ट्रंप के मुकाबले ज्यादा कठिन होगा क्योंकि सिर्फ आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर ही नहीं, पर्यावरण और मानवाधिकारों पर भी अब अमेरिकी दबाव बढ़ जाएगा। ये वो मुद्दे हैं जिन पर ट्रंप ने व्यापारिक फायदे के लिए ध्यान देना ही बंद कर दिया। जबकि इन दोनों ही मुद्दों पर चीन बहुत कमजोर स्थिति में है। हुआवे और 5जी तकनीक को लेकर शायद बाइडेन और ट्रंप में कोई अंतर नहीं होगा।

यह बात भी चीन को परेशान कर रही है और इसकी झलक शी के भाषण में दिखी जब उन्होंने यह घोषणा की कि अगले साल शी चोंगक्विंग में चीन-एससीओ डिजिटल इकोनॉमी फोरम की मेजबानी करेंगे। रूस के डिजिटल इकोनॉमी और 5जी के मुद्दे पर चीन को समर्थन से साफ है कि तकनीकी वर्चस्व की लड़ाई में चीन और रूस अमेरिका और यूरोप के विरुद्ध साथ-साथ खड़े होंगे। ज्यादातर विश्वनेताओं का मानना है कि विश्व व्यवस्था में सुधार लाने के लिए दुनिया को परिमार्जित बहुध्रुवीय व्यवस्था की तरफ बढ़ना ही पड़ेगा।

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