ये है इस चिराग को पाने की प्रक्रिया

नई दिल्ली. जिस तरह भारत में प्रधानमंत्री बनने के लिए किसी भी पार्टी के पास 273 का जादुई अंक होना जरूरी है, ठीक वैसे ही अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के लिए भी 270 अंक वाला चिराग हासिल होना जरूरी है जिसे घिसते ही दुनिया के सबसे शक्तिशाली भवन व्हाइट हाउस के दरवाजे खुल जाते हैं। इन दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव मीडिया और सोशल मीडिया में छाया हुआ है और भारत के लोग से यहां के आम चुनाव जैसा समझ रहे हैं। है तो वहां का चुनाव भी आम चुनाव लेकिन वह भारत जैसा नहीं बल्कि एक जटिल प्रक्रियागत चुनाव है।

उम्मीदवार बनने के लिए भी चुनाव

अमेरिका में दोनों प्रमुख राजनीतिक दल रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी राष्ट्रपति उम्मीदवार के चयन को लेकर जनता के बीच जाती हैं। दोनों पार्टियों में उम्मीदवार बनने की चाहत रखने वाले लोग हर स्टेट में प्राइमरी और कॉकस इलेक्शन में हिस्सा लेते हैं। प्राइमरी और कॉकस चुनाव में जीतने वाले दोनों पार्टियों की ओर से उम्मीदवार बनता है। अमरीकी राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिए जन्म आधारित अमरीकी नागरिकता जरूरी है। कम से कम 35 साल के उम्मीदवार को 14 सालों से वहां का निवासी होना चाहिए।

जीतना होता है प्राइमरी और कॉकस चुनाव

डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी हासिल करने की चाहत रखने वाले लोग सभी राज्यों में प्राइमरी और कॉकस चुनाव का सामना करते हैं। प्राइमरी और कॉकस चुनाव जीतने के बाद इन्हें निश्चित संख्या में डेलिगेट्स का समर्थन हासिल होता है। इस प्रक्रिया में पार्टी के डेलिगेट्स की तय संख्या अपने पक्ष में कर लेने वाला पार्टी का औपचारिक उम्मीदवार बन जाता है।

कॉकस का आयोजन स्कूल जिम, टाउन हॉल समेत अन्य सार्वजनिक स्थानों पर होता है। कॉकस एक तरह की स्थानीय बैठक है। इनका आयोजन दोनों प्रमुख पार्टियां करती हैं। बैठक में रजिस्टर्ड पार्टी मेंबर्स जुटते हैं और राष्ट्रपति उम्मीदवारों के चयन को लेकर समर्थन देने पर बात करते हैं।

कॉकस में हिस्सा लेने वाले लोग राष्ट्रपति प्रत्याशी नहीं चुनते हैं बल्कि डेलिगेट्स का चुनाव करते हैं। ये डेलिगेट्स कन्वेंशन स्तर पर अपने उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करते हैं। डेलिगेट्स नेशनल कन्वेंशन के लिए राज्य से और कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट कन्वेंशन से चुने जाते हैं।

उम्मीदवारी के बाद असली चुनाव

रिपब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी उम्मीदवारों की घोषणा के बाद दोनों कैंडिडेट देश भर में अपने एजेंडा के साथ एक दूसरे पर तीखे हमले करते हैं। आठ नवंबर को वोटिंग के 6 हफ़्ते पहले दोनों कैंडिडेट्स के बीच टेलिविजन पर तीन प्रेजिडेंशल बहस होती है। जो उम्मीदवार सभी राज्यों में सबसे ज़्यादा वोट हासिल करता है, वह राष्ट्रपति बनता है। अमरीकी चुनाव में इलेक्टोरल कॉलेज सिस्टम बेहद अहम है। यह लोगों का समूह होता है जो 538 इलेक्टर्स को चुनता है। जिसे 270 इलेक्टर्स का समर्थन मिल जाता है वह अमेरिका का अगला राष्ट्रपति बनता है। दो कैंडिडेट्स के मैदान में आ जाने के बाद 270 इलेक्टर्स पाने की रेस सभी राज्यों में शुरू हो जाती है।

इलेक्टोरल कॉलेज क्या है?

इलेक्टोरल कॉलेज के ज़रिए 538 इलेक्टर्स को चुना जाता है। ये इलेक्टर्स ही अमरीकी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का फ़ैसला करते हैं। जब वोटर्स आठ नवंबर मंगलवार को वोट करने जाएंगे तो वे अपने पसंदीदा उम्मीदवार के इलेक्टर्स को अपने स्टेट में चुनेंगे। जो उम्मीदवार इलेक्टोरल का बहुमत हासिल करेगा वह अमेरिका का अगला राष्ट्रपति होगा। 538 इलेक्टर्स में 435 रिप्रेजेंटेटिव्स, 100 सीनेटर्स और तीन डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया के इलेक्टर्स होते हैं।

बहुमत नहीं मिले तो?

यदि किसी को भी बहुमत से इलेक्टोरल वोट्स नहीं मिलते हैं तो चुनाव अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के पास चला जाता है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव उन तीन दावेदारों को चुनता है जिसने ज्यादातर इलेक्टोरल वोट्स जीते हैं। प्रत्येक राज्य को एक वोट का अधिकार दिया जाता है। जो भी ज़्यादातर राज्यों का वोट हासिल करता है वह राष्ट्रपति बनता है। यही प्रक्रिया उपराष्ट्रपति के चुनाव में भी अपनाई जाती है।

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