Advertisement
Subscribe for notification

इस फसल को उगाने में भारत ने चीन को पछाड़ा, 35 प्रतिशत पानी की भी करता है बचत

Advertisement

 

Advertisement

नई दिल्ली ब्यूरो

पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक और अन्य राज्यों में धान की खेती करने वाले किसानों को धान की खेती के ज्यादा उचित तरीके, डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) अपनाने के लिए प्रेरित करने और प्रशिक्षण देने में बेहद सफलता पाने के बाद, कृषि और संबंधित क्षेत्रों में काम करने वाली स्वैच्छिक संस्था, रूट्स फाउंडेशन ने चावल की खेती में पानी की खपत को कम करने के लिए 2022 तक और 20-25 लाख किसानों को डीएसआर तकनीक में प्रशिक्षित करने की योजना बनाई है। यह तकनीक धान में पानी के उपयोग को 35-40 प्रतिशत और सीएच4 और कार्बन के उत्सर्जन को 20-30 प्रतिशत तक कम कर देती है।

पांच से अधिक राज्यों में दस लाख किसान प्रशिक्षित

रूट्स फाउंडेशन ने अब तक 5 से अधिक राज्यों में लगभग 10 लाख धान किसानों को डीएसआर तकनीक में प्रशिक्षित किया है। जिलों और किसानों की पहचान, कृषि विस्तार कर्मियों को प्रशिक्षण, किसानों को डीएसआर पर प्रदर्शन, फसल प्रबंधन की सहायता, और राज्य कृषि विभाग के अधिकारियों और केवीके कर्मचारियों के साथ डीएसआर के अभ्यासों पर संयुक्त फील्ड दिवस और किसान सम्मेलन इस कार्यक्रम के मुख्य घटक हैं। रूट्स फाउंडेशन के संस्थापक ऋत्विक बहुगुणा के अनुसार भारतीय कृषि के लिए किसानों को नवीन और टिकाऊ टेक्नोलॉजी और तकनीकों में प्रशिक्षित करना महत्वपूर्ण है। भारत के एक बड़े हिस्से में पानी और ज्यादा मेहनत वाली धान की खेती का प्रभुत्व है। चूंकि पानी हर गुज़रते दिन के साथ और भी दुर्लभ संसाधन बन जाता है, इसलिए खेती के तौर-तरीकों में बदलाव की सख्त ज़रूरत है।

देश की सकल फसलों में धान का हिस्सा 24 प्रतिशत

डीएसआर में, पहले से ही अंकुरित बीज सीधे ट्रैक्टर चालित मशीन द्वारा खेत में ड्रिल किए जाते हैं। इस तरीके में नर्सरी की कोई तैयारी या रोपाई शामिल नहीं होता है। किसानों को केवल अपनी ज़मीन समतल करनी है और बुवाई से पहले खेत की सिंचाई करनी है। ज्यादातर किसान अब तक धान की जिस नियमित रोपाई उपयोग कर रहे हैं, यह तकनीक उसकी तुलना में अधिक वैज्ञानिक है। धान सबसे महत्वपूर्ण फसल है और देश के सकल फसली क्षेत्र का लगभग 24 प्रतिशत है। भारत धान के उत्पादन में दूसरे स्थान पर (99.5 मीट्रिक टन) है। पहले स्थान पर चीन है।

पंजाब में 80% और हरियाणा के 70% हिस्से में पानी की कमी

बहुगुणा ने कहा कि “कम उत्पादकता, पानी और श्रम की कमी, नवाचारों की कमी, और कम लागत-लाभ अनुपात देश में धान की खेती को नुकसान पहुंचाते हैं। डीएसआर और बेहतर खरपतवार नियंत्रण अभ्यासों को अपनाने से, हम चावल की पैदावार को 10% तक बढ़ा सकते हैं, जिससे जल संसाधनों की बचत होती है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार, पंजाब के 80% और हरियाणा के 70% हिस्से में पानी की कमी है। प्रति वर्ष औसत गिरावट 30-40 से.मी. है और कुछ स्थानों पर 1 मीटर तक जाती है। धान की रोपाई में समय और पानी दोनों ही लगता है। डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) ऐसे क्षेत्रों में सबसे प्रभावी तकनीक है।

उद्योगों की खपत के बराबर बचा देगा पानी

संस्थापक ने कहा, “हम पंजाब और हरियाणा में डीएसआर का कार्यान्वयन करने वाली सबसे बड़ी एजेंसी हैं। पूरे भारत में 10 लाख से अधिक किसानों ने प्रशिक्षण लिया। मुख्य चुनौती खरपतवार द्वारा उपज के नुकसान को कम करना है। तकनीकी नवाचार और हस्तक्षेप असामान्य है और डीएसआर पानी की खपत को 30 प्रतिशत तक कम कर सकता है। इसमें पारंपरिक रोपाई की तुलना में कम श्रम की ज़रूरत होती है। आखिरकार, यह तकनीक धान उत्पादन की लागत को प्रति एकड़ 5000-11,000 रुपये के बीच कम करता है।” इन आंकड़ों को पंजाब कृषि विश्वविद्यालय जैसे क्षेत्र के अधिकारियों द्वारा मान्य किया गया है। फाउंडेशन का अनुमान है कि भले ही 25% भारतीय चावल की खेती को डायरेक्ट सीडिंग में स्थानांतरित कर दिया जाए, तो पानी की बचत भारतीय उद्योग द्वारा खपत किए जाने वाले कुल पानी के बराबर होगी।

Hindi News: