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साल 2023 तक रहेगा कोरोना का असर, उसके बाद हो जाएगा गायब !

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एक महामारी विज्ञानी की भ​विष्यवाणी

एक अमेरिकी महामारी विज्ञान प्रोफेसर का दावा है कि भारत में करीब 60 करोड़ लोग कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं और करीब बीस लाख से अधिक मौत हो चुकी हैं। हालांकि विज्ञानी ने ये दावा यह कहते हुए किया है कि उसे भारत सरकार के आंकड़ों पर भरोसा नहीं है क्योंकि उसने आंकड़ों को छुपाने की कोशिश की है। अमेरिकी मिशिगन यूनिवर्सिटी में जैव-सांख्यिकी और महामारी विज्ञान की इस प्रोफेसर का नाम भ्रमर मुखर्जी हैं।

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​बीस में से एक मामले की आई रिपोर्ट

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मुखर्जी ने कहा कि उन्हें भारत सरकार के संक्रमण मृत्यु दर यानी संक्रमित लोगों के मरने की दर के 0.05 प्रतिशत के अनुमान पर विश्वास नहीं है। उनका अनुमान है कि 15 मई तक भारत में छह के कारक से मामले कम बताए जा रहे थे, और हर 30 पर छह मौतें स्वीकार की जा रहीं थीं। ‘भारत में 15 मई तक कम बताने का ये फैक्टर 6 के क़रीब है। 15 मई को मौतों की अधिकारिक संख्या 2,70,000 थी। कुल संख्या का हमारा जो अनुमान है, वो 12.5 लाख का है। अब मौतों की अधिकारिक संख्या 400,000 है इसलिए अस्ली अनुमान 20-22 लाख के क़रीब होगा। हमने देखा है कि 15-20 मामलों में से केवल एक केस रिपोर्ट किया गया। जब भारत ने 3 करोड़ केस रिपोर्ट किए तो वास्तव में ये संख्या 60 करोड़ थी।

ये बेईमानी है…..

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार प्रोफेसर मुखर्जी ने कहा कि भारत सरकार का 0.05 प्रतिशत संक्रमण मृत्यु का अनुमान सही तस्वीर पेश नहीं करता और ये ‘बेईमानी’ है। ये एक अनुपात है इसलिए कोई ये नहीं कह सकता कि अंश अखंड है जबकि विभाजक बढ़ा हुआ है। हमने मामलों और मौतों की संख्या दोनों में कम बताने का कारक शामिल किया है और 0.24 प्रतिशत की संक्रमण मृत्यु दर पर पहुंचे हैं जो 0.27 प्रतिशत वैश्विक मध्यम आईएफआर (संक्रमण मृत्यु दर) के बराबर है। ये पूछे जाने पर कि सार्स-सीओवी-2 दुनिया को कितने समय तक बेचैन रखेगा। उन्होंने कहा कि 2022 अभी भी अप्रत्याशित साल साबित हो सकता है और शायद 2023 वो साल होगा जब दुनिया आख़िरकार वायरस के साथ जीना सीख जाएगी।

उनका कहना है कि महाराष्ट्र, केरल, आंध्र प्रदेश और दिल्ली में कोविड-19 मामलों की सप्ताह-दर-सप्ताह विकास दर बढ़नी शुरू हो गई है और अब शायद समय आ गया है कि इन जगहों में तुरंत ज़्यादा पाबंदियां लगा दी जाएं। मुखर्जी और उनकी टीम निर्पेक्ष आंकड़ों की बजाय सप्ताह-दर-सप्ताह बदलाव की तुलनात्मक दरों पर नज़र रखती है। फरवरी में ही उन्होंने पूर्वानुमान लगा लिया था कि भारत में जल्द ही दूसरी लहर आ रही है।

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