विश्व अल्जाइमर दिवस: भारतीयों को अल्जाइमर विकसित होने का खतरा ज्‍यादा क्‍यों होता है. वैसे ये रोग आमतौर पर 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में होता है. अल्जाइमर के साथ न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी हो जाती है जिससे मस्तिष्क की कोशिकाएं सिकुड़ जाने के साथ ही मर जाती हैं. डॉक्टरों का कहना है कि कोरोना महामारी के बाद अल्‍जाइमर के रोगियों की संख्‍या बेतहाशा बढ् गई है.

क्यों बढ़ रहा है अल्जाइमर ?

मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मोटापे जैसी बीमारियों के अलावा बढ़ते जीवनकाल से भारत में अल्‍जाइमर बहुत तेजी से फैल रहा है. अल्जाइमर मनोभ्रंश का सबसे सामान्य रूप है. यह आमतौर पर 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में होता है. जब भारतीयों की औसत आयु 50 वर्ष से कम थी तो ये बीमारी नहीं के बराबर होती थी. अब अधिक से अधिक लोग 70 वर्ष से अधिक आयु पा रहे हैं.

भारत में मनोभ्रंश रिपोर्ट 2020 का अनुमान है कि 60 वर्ष से अधिक आयु के 5.3 मिलियन लोग इस बीमारी के शिकार हैं और उनकी संख्‍या 2050 तक 14 मिलियन हो जाने की आशंका है.

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में क्लिनिकल न्यूरोफिज़ियोलॉजी के प्रोफेसर डॉ अचल कुमार श्रीवास्तव का अनुमान है कि अल्जाइमर ग्रस्‍त लोगों की संख्या में 15 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है. उनका मानना है कि कोरोना वायरस ने कई न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों को ताकत प्रदान कर दी है और लोग तेजी से उसकी चपेट में आ रहे हैं.

फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम में न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ प्रवीण गुप्ता का मानना है कि कोविड ने अल्जाइमर रोगियों की मानसिक हालत तेजी से खराब कर दी है. कोरोना के दौरान घरों से निकल नहीं पाए बुजुर्गों की याददाश्त और बिगड़ती चली गई.

कोलंबिया विश्वविद्यालय की ओर से किए गए एक अध्ययन में कोविड -19 से मरने वाले रोगियों के मस्तिष्क में समान आणविक परिवर्तन पाए गए. ये परिवर्तन अल्जाइमर रोगियों के मस्‍तिष्‍क में पाया जाता है. शोधकर्ताओं ने कहा कि न्यूरॉन्स में एक प्रकार के दोषपूर्ण रिसेप्टर के कारण हुई वृद्धि अल्जाइमर फैलने का कारण बन गई है. एक अन्य अध्ययन में कहा है कि कोरोना संक्रमण से मस्तिष्क के कुछ हिस्सों को नुकसान पहुंचाने वाले छोटे स्पर्शोन्मुख स्ट्रोक आ सकते हैं.

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